
निरा हठ नहीं है,
चांद-तारों तक पहुँचने की मेरी कोशिश,
ना ही यह कोरी ललक है;
ऐसा करना मेरा स्वभाव है,
और यह मेरे प्रयत्नों पर मेरे अधिकार की झलक है ।
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यह परिणाम की लालसा नहीं,
जो मुझे दिशा, बल और प्राण देता है;
अमिट जिज्ञासा पाँव रुकने नहीं देता,
और कुछ रचने का आवेश,
हर पल गति और स्वाभिमान देता है ।
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रचने की उत्कट इच्छा, महत्वाकांक्षा है,
या है इसका कुछ और ही विधान;
यह प्रश्न सदा ही अनुत्तरित,
एक पल ये हैं विपरीत, अगले क्षण लगें एक समान ।
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ना तो मात्र परिणाम का क्रूर आकर्षण है,
ना ही अपने साथ बहा ले जाता उद्देश्य का बहाव है;
बस जगता है, चाहे-अनचाहे,
और पता नहीं चलता है,
प्रारब्ध है, प्रतिबद्धता है या स्वभाव है ।
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महत्वाकांक्षा भविष्य की आशा का,
वर्तमान में भविष्य का उभरता आकार है;
अपने सामर्थ्य के स्वीकार की अभिव्यक्ति है,
और रचना की मूल प्रवृत्ति का उद्घोष साकार है ।
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महत्वाकांक्षा परंतु निर्मल हो कर भी,
अपनी ऊर्जा का दास होता है,
वहीं रचनाधर्मिता का एक अलग विन्यास होता है;
पहला नीतियों का और न्याय का,
परिणाम हेतु बलि देने में संकोच नहीं करता है;
दूसरा सकल कल्याण को,
अपने ही नियंत्रण और अंकुश की बलि चढ़ता है ।
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अब तारे चाहे मुट्ठी में ना हों,
प्रयत्न में आस्था है, प्रयत्न के प्रति समर्पण है;
शायद मैं यह संघर्ष तुम्हारे लिये छोड़ जाऊँ,
पर अन्याय को नहीं मेरा समर्थन है ।
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