
जिससे भी मिला,
उसने यही बताया,
कि पूरी पड़ताल के बाद,
उसने अपने जीवन का अक्ष,
अपने से दूर पाया,
और यह भी कि यह दूरी,
बढ़ती ही जा रही है,
और किसके चाहे ऐसा हो रहा है,
यह बात समझ में नहीं आ रही है ।
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जीवन के अक्ष को,
अपने समीप पाना,
या उसका अपने अस्तित्व के केंद्र से,
गुजरने की इच्छा रखना,
उचित है या अनुचित,
कौन कहे,
और क्या हो इसका परिणाम,
स्पष्ट है, बस एक अनुमान रहे,
अद्भुत अपेक्षा, अद्भुत परिस्थिति,
कोई तर्क नहीं,
मात्र विवाद और असहमति ।
.
हमारे अक्ष के हमसे दूर जाने से,
क्या वह दूसरे के अक्षों के पास आता है,
दो पृथक अस्तित्वों के,
बीच की दूरी को घटाता है,
क्या यह वस्तुत:,
हमें एक-दूसरे से जोड़ने का उपक्रम है,
और सीमित करता हमारी चिंतन का भ्रम है,
कि अपने ही अक्ष पर निर्बाध घूम पाना,
स्वच्छंदता है,
शेष मात्र उलझाता तान-बाना,
और अपूर्ण स्वतंत्रता है ?
.
है अंतिम उत्तर कहीं नहीं,
और कदाचित हो कभी नहीं,
हम जो भी मानेंगे, निश्चय ही सापेक्ष है,
परंतु विश्वास रखना
कि जीवन निष्ठुर नहीं निर्पेक्ष है,
उसका दायित्व हमें आकाश देना है,
धरती देनी है और प्रकाश देना है,
देना पीड़ा का गरल,
या हर्ष का अमृत निर्मल,
इसका अभिप्राय हो असम्भव है,
क्योंकि उसके पास भाव नहीं मात्र भव है,
और उसके पास है समय, ऊर्जा, प्राण,
और सारी संभावनाओं से भरा अनंत निर्पेक्ष वितान ।
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हमें सब कुछ दे कर,
वह तटस्थ हो,
परे हट जाता है,
सारा विस्तार हमें दे,
मात्र पर्यवेक्षक बन,
दूर सिमट जाता है ।
.
परंतु चेतना निर्पेक्ष नहीं हो सकती,
उसे चाहिये रंग, गंध, स्वाद और गति,
इसलिये हम विश्लेषण करते हैं,
रचना और विध्वंस के संग-संग,
निरंतर नये अन्वेषण करते है ।
.
इस प्रक्रिया में ,
सम्पूर्ण से सुख को अलग करते ही,
स्वत: विषाद उत्पन्न होता है,
प्रेम को परिशोधित करते हैं,
तो वितृष्णा का सृजन होता है,
इसी भाँति मोह- विराग, अहंकार-विनम्रता,
ज्ञान-प्रमाद, अधिकार-समर्पण, वर्चस्व-समता,
जीवन की सम्पूर्णता के निर्पेक्ष तरल से बनते हैं,
जैसे श्वेत प्रकाश के पुंज,
विघटित हो सात रंग जनते हैं ।
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हमारे बनाये अवयवों से,
असहज जीवन पटल है,
मूलत: जीवन की कल्पना,
निर्पेक्ष और सरल है ।
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