हे रचनाकार

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नत होना और उन्नत होने को,

हो समर्पण, सम्मान का सोपान,

आराधना चित्त के शुद्धिकरण को,

सर्व-मंगल भाव सिंचित हो प्राण ।

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मन का विचरण हो स्वच्छंद,

सब का अपना उन्मुक्त गगन हो,

नयन क्षितिज के पार हों केंद्रित,

स्नेह सिक्त मन का आंगन हो ।

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न ज्ञात, न अज्ञात का भय हो,

बंधन जोड़ें, पर करते निर्भय हों,

विधि-विधान आतंक मुक्त हो,

न्याय करे, जो सदा सदय हो ।

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हो सत-चित्त-आनंद की चिर आशा,

उन्नति, रचना, प्रथम धर्म हो,

किसी अपेक्षा से न हो बाधित,

संपूर्णता को लक्षित प्रत्येक कर्म हो ।

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हर विचार का एक स्थल हो,

हर संवेदना आदर का अधिकारी,

हर चेतना स्वतंत्र चुनने को,

अपना ईंधन और अपनी चिंगारी ।

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अभिव्यक्ति नहीं अनुमति पर आश्रित,

संवाद कभी न हो बाधित,

स्पर्श सभी को मृदुल पवन-सा,

ऐसे आलोचना हो मर्यादित ।

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तेरी रचना में महा पूर्णता,

सारी संभावनाओं का संसार,

मात्र अपेक्षा, समर्थ हमें कर,

हम अपना रच पायें, हे रचनाकार ।

poems.bkd@gmail.com

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