स्तुति

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प्रार्थना ऐसी हो मेरी,

जिसमें कोई भी अपेक्षा न हो ।

आभार और श्रद्धा तो हो,

परंतु अवांछित दासता न हो ।

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पूजा ऐसी हो मेरी,

जिसमें निहित याचना न हो,

हो भाव समर्पण का प्रबल,

परंतु अशक्त दीनता न हो ।

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विचार ऐसा हो मेरा,

जो कभी भी न विभाजित करे,

ढूँढे अर्थ जीवन का हर क्षण,

परंतु गहे अहं की कालिमा न हो ।

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शब्द ऐसे हों मेरे,

हो जिनमें स्पष्टता, संवेदना,

करे सत्य का अनुशीलन,

परंतु प्रगल्भ हठ-धर्मिता न हो ।

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विवेक ऐसा हो मेरा,

हो सकल कल्याण का वाहक जो,

दृढता से दिशा निर्देश करे,

परंतु मृदुलता का घातक न हो ।

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धर्म ऐसा हो मेरा,

जो सकल जग धारण कर सके,

पुण्य की विवेचना करे,

परंतु नव्यता का अवरोधक न हो ।

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