
प्रार्थना ऐसी हो मेरी,
जिसमें कोई भी अपेक्षा न हो ।
आभार और श्रद्धा तो हो,
परंतु अवांछित दासता न हो ।
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पूजा ऐसी हो मेरी,
जिसमें निहित याचना न हो,
हो भाव समर्पण का प्रबल,
परंतु अशक्त दीनता न हो ।
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विचार ऐसा हो मेरा,
जो कभी भी न विभाजित करे,
ढूँढे अर्थ जीवन का हर क्षण,
परंतु गहे अहं की कालिमा न हो ।
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शब्द ऐसे हों मेरे,
हो जिनमें स्पष्टता, संवेदना,
करे सत्य का अनुशीलन,
परंतु प्रगल्भ हठ-धर्मिता न हो ।
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विवेक ऐसा हो मेरा,
हो सकल कल्याण का वाहक जो,
दृढता से दिशा निर्देश करे,
परंतु मृदुलता का घातक न हो ।
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धर्म ऐसा हो मेरा,
जो सकल जग धारण कर सके,
पुण्य की विवेचना करे,
परंतु नव्यता का अवरोधक न हो ।
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