
मेरे नहीं तो किसी और के घर,
खुशी, कुछ देर और ठहर,
जीना आता है तेरे बिन लेकिन,
अच्छा लगता है तेरे साथ सफर ।
.
आज भी तेरा पता मालूम नहीं,
लोग पूछते हैं, मैं टाल देता हूँ,
मुस्कुराता हूँ कि तलाश तेरी,
ले कर गयी मुझको किधर-किधर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
.
लोग कहते थे तुम्हारे बारे में,
कि तुम कभी भी मिल सकती हो,
खोजता हूँ तुझे रात के अंधेरों में,
और ढूँढ़ता हूँ सुबह, शाम, दोपहर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
.
फूलों से, तितली से, पंछी से,
माँगी उधार, तो वे कहने लगे,
तलाश अपनी, है तुझ में ही कहीं,
फिर सम्हाल ले जा उसे अपने घर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
.
खयाल रखूंगा तेरी नाजुक मिजाजी का,
वादा है दूर से ही देखूंगा तुझको,
कल जरा-सा जो छू के देखना चाहा,
तुम टुकड़ों में टूट कर थी गयी बिखर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
.
बड़ दिलचस्प है रिश्ता हमारा तुम्हारा,
किसी भी जगह या तुम हो या हम,
तुम क्या करती हो मालूम नहीं मुझको,
तेरी आहटों से मैं जाता हूँ निखर-निखर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
.
शायद मैंने ही की कोशिश कुछ कम,
वरना जाती नहीं तुम बार-बार आकर,
तुझे उसकी या मेरी में नहीं बाँटूंगा कभी,
कहीं ठहर, बस थोड़ा और ठहर ।
खुशी, कुछ देर और ठहर ।
poems.bkd@gmail.com
