
मेरी आवश्यकता, आकांक्षा और आशा की,
अनवरत एक त्रिवेणी बहती है,
जो समय के बहुरंगी पटल से गुजरती,
.
कभी-कभी समतल विस्तार से,
नन्हे शिशु-सा, विस्मय के भार से,
अचंम्भित हो,
भूल कर गंतव्य को,
कुछ सुनती है, न कहती है ।
अपने रूप बदलती रहती है ।
और कभी ढलान पर,
गति पर अपना पूरा अधिकार मान कर,
बिना अगले पल का विचार किये,
न जीत के लिये, न हार के लिये,
बस प्रचंड वेग प्राप्ति को बहती है ।
अपने रूप बदलती रहती है ।
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गुजरते हुए पत्थरों से अवरुद्ध मार्ग से,
क्षत-विक्षत हो नुकीले चट्टानों की धार से,
फेनिल हो और आर्तनाद करते,
आघात से जूझते आत्मसात करते,
परीक्षा मान यंत्रणा सहती है ।
अपने रूप बदलती रहती है ।
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एक चेष्टा जो अब तक है अर्धपूर्ण,
शैशव की लालसा, यौवन का स्वप्न,
ऊपर उठूँ, गुरुत्व के नियम तोड़,
संवेग जोड़, हो एकाग्र विभोर,
प्राण के अंतिम छोर तक जा,
अनुभूति आनंद के दे सर्वथा,
यत्न कुछ और बढ़ाने को कहती है ।
अपने रूप बदलती रहती है ।
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