जीवन अबुझ और अप्रमेय

Photo by Alan Cabello on Pexels.com

हृदय विह्वल,

नयन सजल,

सखा भाव की पराकाष्ठा,

या मन नत और आभार विकल,

सौंदर्य की महिमा से सम्मोहित,

या नश्वरता का आतंक अटल,

अस्तित्व, उद्देश्य के द्वन्द्व सघन,

या एकांत की नीरवता विरल,

चिंता निर्माण के दायित्वों का,

या कल के स्वागत में जी विह्वल,

जीवन धन्य भावों का अभिनंदन से,

या गंतव्य के आरोहण से है सफल ?

.

भावों का अतिरेक,

जिज्ञासा, विस्मय समेत,

गहे प्राण को समय मुट्ठी में,

या उगता जीवन समय को भेद,

जीवन रौद्र, बलि और शोणित,

या संरचना, उद्यम और स्वेद,

विध्वंश की आशा परिवर्तन को,

या पग-पग चढ़ते शिखर अनेक,

संगठन, रणनीति, राजनीति,

या स्वच्छंद मानवता का अभिषेक,

टिका अधर में उहापोह में,

कहाँ मिले समुचित विवेक ।

.

गर्भ धरे चिर विस्मय,

हर क्षण अद्भुत, अपरिमेय,

जीवन क्षण से या क्षण ही जीवन,

पराक्रम लक्ष्य या सौन्दर्य हो ध्येय,

रचना का कर्ता या मात्र एक रचना,

जीवन अबुझ और अप्रमेय ।

poems.bkd@gmail.com

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment