
चढ़ती हुई दोपहर है,
इसे शाम मत कहो,
हर दौर खूबसूरत है,
इसे कोई नाम मत दो ।
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जीये अपनी अंदाज में,
बस इतना भी कम नहीं,
उस पर शबाब यह,
कि तुम सब भी साथ हो ।
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मुझे मालूम नहीं,
इस जहाँ में अहमियत मेरी,
पर इसका वजूद इसी से,
कि मैं हूँ और तुम हो ।
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कब किससे जुड़ा, जुदा हुआ,
अब याद नहीं मुझे,
हसरत और दुआ यही है,
कि तेरा हरदम साथ हो ।
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रंग बहुत से मिले,
कुछ ठहरे, कुछ बिखर गये,
कोई गिला शिकवा नहीं,
बस तुम संग होने का दम भरो ।
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किसी को क्या हिसाब दूंगा,
न सोचा है, न सोचूंगा,
मैं तरी नजरों में खरा रहूँ,
तुम नजरों में तुम रहो ।
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