प्रतिफलन

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मरघट पर जितने वीर मिले,

कुछ चकित, भ्रमित, अधीर मिले,

निकट कहीं रुधिर रंजित,

धनुष, तुणीर और तीर मिले ।

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सब की आत्मा प्रश्न एक ही था,

परिपूर्ण हुआ या गया वृथा,

संकल्प लिये जो हमने थे,

हे बंधु, कहो उसका क्या हुआ ?

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पूछा:

हे वीर, तुम्हारा शौर्य प्रखर,

तेरी आहूति ध्वज बन कर,

बन दिव्य ज्योति स्थापित है,

शेष यह आसक्ति अब क्योंकर ?

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बिना निमेष बलिदान दिया,

तेरी गाथा तेरे धूमिल नहीं हुई,

क्या हुआ यह ललक नहीं छूटी,

क्या आहूति भी निष्काम नहीं ?

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उत्तर:

आदर्श नहीं होता श्री विहीन,

वैराग्य कदापि नहीं अर्थहीन,

निष्काम कर्म नहीं निष्प्रयोजन,

हर क्रिया एक उद्देश्य अधीन ।

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हर कर्म सदैव परिणाम हेतु,

हर चेष्टा उन्मुख उपलब्धि को,

लोलुप आसक्ति है वर्जित,

कलुषित करता मत, नीति को ।

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लक्ष्य अहम् से गुरुतर हो,

उद्देश्य हो व्यापक सर्वांगीण,

क्षितिज के पार की दृष्टि हो,

सकल हित विवेक हो समीचीन ।

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जीवन अर्हित उद्देश्य से है,

और उद्देश्य कर्म का निर्माता,

बलिदान कर्म का शिखर बिंदु,

इनके फलन से सार्थक मानवता ।

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