अनुकम्पा

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जीवन के अविरल प्रवाह में,

मेरे चाहे, अनचाहे,

कुछ प्रसंग जुड़े, कुछ प्रश्न जुड़े,

कुछ घटनाएँ घटी, कुछ संभावनाएँ घटी,

जो शेष बचा,

वह मैं था,

इतना भी अकिंचन नहीं,

कि इसे अपना किया स्वीकार ना करूँ,

इतना भी प्रगल्भ नहीं,

कि इसमें तेरी महिमा को शिरोधार्य ना करूँ,

ज्ञात नहीं तेरा विधान था,

अथवा मेरा नवनिर्माण,

मैं ने कई सारे संभाव्य बुने,

पथ पर बिछे कुछ फूल चुने ।

.

जितने फूल चुने मैं ने,

दिया तुमने ऐसा स्मरण नहीं,

फिर भी आभार तुम्हारा,

कि तुमने उन्हें चुनने का झुकाव दिया,

और चुन पाने की क्षमता का विश्वास दिया,

और फिर कभी मुझे अंगुली पकड़ चलाया नहीं,

छोड़ दिया इस अनंत विस्तार में,

बस पैरों के नीचे धरती दी,

और सिर के ऊपर आकाश दिया ।

.

आभार मुझ पर इस अनुकम्पा के लिये,

आभार इस स्वच्छंदता के लिये,

आभार मुझ में दिये स्वाभिमान के लिये,

आभार जीवन के सारे संग्राम के लिये ।

.

अभी बहुत सारे प्रतिवाद हैं, उपालम्भ हैं,

पर क्या होता,

यदि तुम नहीं देते जो दिया,

क्या हम कह पाते,

कि यह जीवन है,

जिसका हर अणु जीवंत है,

और अर्थपूर्ण प्रत्येक क्षण है ।

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