
कहाँ से जगती सहज भावना,
जुड़ती कहाँ से भाव, चेतना,
रहस्य आज भी उतना ही अनबुझ,
किस विधि मानस पटल बना,
.
किसी ने अपरिमित प्यास दी,
किसी ने दी छलनामयी तृप्ति,
किसी ने दी देखने की इच्छा,
किसी ने देख पाने की दृष्टि,
.
कहीं से आयी मायावी आसक्ति,
कहीं से उपजा मधु सा मोह,
कहीं जन्मी प्ररखर अभिव्यक्ति,
और कहीं से जग उठा उहापोह,
.
कोई मर्म पर औषधि धरता,
देता कोई कुटिल, कठोर आघात,
दिये किसी ने दिवस अंधेरे,
और किसी ने दी चमकीली रात,
.
आतंक धवल की चकाचौंध का,
और मादक अंधेरा अपरंपार,
बीच सदा ही दिया किसी ने,
अनंत रंगों का ललित उपहार,
.
उद्ग्रीव मन संग सजग चेतना,
रचते आभिजात्य और नवनिर्माण,
और शून्य के गहन ध्यान में,
अर्थ जीवन का ढूंढे किसी के प्राण,
.
विस्मयजन्य हृदय का स्पंदन,
अविश्वसनीय मन का पटल विशाल,
चाहे जानना फिर भी यह प्राणी,
क्या है क्षितिज के पार का हाल,
.
ज्ञान मृत्यु और अमरता का,
युगों से छलता रहा निरंतर,
परिभाषित फिर भी करना चाहे,
क्या अमर और क्या है नश्वर,
.
जीवन विविधता का है उत्सव,
वृथा परिभाषा और समाधान,
संयोग, जिज्ञासा, सहजीवन,
इसके तन, मन और प्राण,
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