
पीड़ा,
थी तो पहले भी,
पर थोड़ी तरल थी,
बहुत ही सरल थी,
दिखती थी,
समझ में आती थी,
अक्सर साथ रहती थी,
बस कभी-कभी कुछ देर के लिये,
दूर चली जाती थी ।
.
पता नहीं कैसे,
अब सख्त हो गयी है,
चुभने लगी है,
नन्ही टहनी से,
अब दरख्त हो गयी है,
जड़ें गाड़ चुकी है,
मेरे हर यकीन पर,
बस उसी की छाया है,
मेरी पूरी जमीन पर,
अब पल भर को भी,
कहीं जाती नहीं है,
पहले की तरह,
रूप रंग बदल पाती नहीं है,
कहाँ से बटोर लिये हैं उसने कंकड़ पत्थर,
पूछना चाहता हूँ कभी उससे मिलकर ।
पूछते हो,
क्यों पाल रखा है मैंने इसको अब तक ?
क्योंकि,
बाकी सारे सहचरों ने,
कभी ना कभी छला है,
बस एक यही है,
जो विध्वंस में, निर्माण में,
मृणमयता में और सजग प्राण में,
बिना डिगे,
मेरे साथ चला है ।
.
तुम निर्पेक्ष, तुम निष्काम,
पीड़ा, तुम्हें प्रणाम ।
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