
तुम कौन हो ?
कुछ कहते हुए या मौन हो,
कभी आँखों ही आँखों में,
कभी मुस्कुराहट से,
कभी अट्टहास से कभी आहट से,
कितना कुछ कह देते हो,
जीवन को कितने रंग देते हो,
फिर से प्राण फूँकने वाले चमत्कार-सा,
अपना अनमोल संग देते हो ।
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यह क्या है ?
जो मुझे एक बच्चे-सा बहलाता है,
चोट लगे तो सहलाता है,
कभी कीचड़ में गिर जाऊँ तो,
उठाता और नहलाता है ।
क्या यह मात्र तुम्हारा साथ है,
या हर कदम मेरी चिंता करने वाला,
तुम्हारा हाथ है ?
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यह कैसे हुआ?
दिन भर हम रोते रहे,
रात भर हम सोते रहे,
हरे भरे मन के आंगन में,
प्यास ही प्यास बोते रहे,
क्या अर्जित किया पता नहीं,
तेरा दिया खरापन खोते रहे ।
तेरा फिर से आभार कि,
दूर मुझसे तुम फिर भी नहीं गये,
निविड़तम अंधकार में भी,
मिलते रहते हैं तुम्हारे जलाये दीये ।
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