सखा भाव

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कभी नरम-नरम, कभी खुरदुरे,

हरदम लेकिन रस से भरे,

बातें तीखी, बातें मीठी,

पर सरल अर्थ से बहुत परे,

कुछ होता है ऐसा ही सखा भाव,

कि परिहास और भी संग जड़े ।

.

रख सम्हाल इसे तू अंकपाश,

सम्बंध नहीं, यह है विश्वास,

जो जीने की इच्छा प्रबल करता,

अंतर्मन को देता आकाश,

प्रश्न उठे क्या पाया जग में,

उत्तर, बंधुत्व और मन का विकास ।

.

अकेलेपन से भय को छीन,

देता बल यदि एकांत में लीन,

पाँव की बेड़ी, न अपेक्षा का भार,

दुर्गम पथ बीते श्रम से विहीन,

छोड़ अहम् हो सहज प्राण,

हो सखा भाव के उल्लास अधीन ।

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