पता नहीं

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दूर की चीजें छोटी दिखती हैं,

यह अभिशाप है या वरदान,

पता नहीं ।

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पुरानी यादें जड़-सी बैठती जाती हैं मन के अंदर,

ठंढी हो जाती हैं,

सिकुड़ कर छोटी हो जाती हैं,

नयी यादों के लिये जगह बनाती हैं,

यह पुरानेपन की नियति है,

या नये का सम्मान,

पता नहीं ।

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दूर कहीं लेट कर,

अंतिम पहर के अंधेरे में,

सर्द आँखों से बीते कल के अपने आप को देखने पर,

जो नजर आता है,

उलझाता है,

लेकिन उससे जो उठती है टीस,

हमारी पूरी लड़ाई उसी से है,

या वही है हमारी पहचान,

पता नहीं ।

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कल जो हम छोड़ आये थे,

बेकार मान कर अपने कई हिस्सों को,

क्योंकि कुछ पुराने लगने लगे थे,

कुछ नयी आदतों को चुभने लगे थे,

फुर्सत की घड़ी में,

अपने से होती बतकही में,

एक सवाल क्यों बार-बार सर उठाता,

और रुला जाता है,

‘क्यों फेंक आये इतने जरूरी सामान,’

तो उत्तर होता है,

पता नहीं ।

.

पौ फटने से पहले,

आकाश से उतरती सुंदरता को निहारता मन,

कब आखेट को निकल पड़ता है,

और कब थकान के आगोश में सो जाता है,

फिर उठ कर,

बीते समय का आकलन कर,

हैरान हो पूछता है,

कि क्या इसी के लिये बना था वह,

क्या जिन्दगी गुजरनी है इसी तरह,

कौन दे सकता है उसके सवालों के जवाब,

और कहाँ ढूंढ सकता है वह अपना खोया अभिमान,

फिर उत्तर होता है,

पता नहीं ।

.

जहाँ हम होते हैं,

वहाँ होना हमारी नियति है,

या उद्गम से हमारी यात्रा का परिणाम,

सफर है मुसलसल,

या है इसका कोई अंजाम,

हजारों बार पूछा गया इस सवाल का,

हर बार लगता है कि मिल गया है जवाब,

पर जैसे ही लगता है,

कि सब कुछ सुलझ गया है,

क्यों किसी कोने में सर उठा कर,

वही सवाल कर देता है हैरान,

पता नहीं ।

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