
किनारे बैठा भला था ।
उस पार की रोमांचक जनश्रुति थी,
बहती नदी में सुन्दरता की अनुभूति थी,
जल के छल-छल में मोहक संगीत था,
पक्षियों के कलरव में राग थे और गीत था,
पानी के वेग से उठता हुआ उन्माद था,
बहती बयार की छुअन में सुरभि थी, आह्लाद था,
सब कुछ समरस था, स्थिरता का भाव था,
जीवन में कोई विक्षोभ नहीं स्थायी ठहराव था ।
.
जीवन भर के चिंतन से जो मनीषियों ने लिखे,
वह सभी कुछ था वहाँ, अंतत: जो चाहिये,
निष्कर्ष तो था वहाँ, निष्कर्ष की यात्रा नहीं थी,
और हठात यह शांति आनंद नहीं तंद्रा लगी ।
.
क्या नहीं था जान पाना इतना भी दुर्बोध नहीं था,
पौरुष को अवलंब देता कहीं कोई प्रतिरोध नहीं था,
स्नायुओं को अर्थ देता ऐसा कोई संघर्ष नहीं था,
हृदय को उद्वेलित करती नहीं थी वेदना और व्यथा,
संवेदना फिर जी उठे, ऐसा कोई स्पर्श नहीं था,
मन का जाया कह सकूँ ऐसा कोई हर्ष नहीं था,
सृष्टि से अनवरत प्रश्न करती कहाँ खोयी वह चेतना,
जीवन में थी मिठास, लावण्य का कोई पुट नहीं था ।
.
दान में सिद्धि मिले, मन तृप्त हो पाता नहीं,
बिन उद्यम के प्राप्त बैकुंठ भी मन भाता नहीं,
पर तथ्य यह पूरा नहीं,
और सत्य तो निश्चय नहीं,
बीतना जीवन का है सत्य निश्चित यद्यपि,
मात्र सुगमता बीतने का हो सकता इसका लक्ष्य नहीं,
अंत तक तो है पहुँचना,
अंत पर जीवन नहीं,
उपस्थित अनगिनत रूप में,
जीवन इष्ट है, अभिप्राय भी ।
.
कौतूहल ले नदी में उतरा,
सृष्टि की विविधता में सानंद चकित-सा,
असिमित विस्तार का एक बौना द्रष्टा,
अपने मन बिंदु में ब्रह्माण्ड समेटे,
अद्भुत गति से दौड़ रहा था,
कभी पाषाणों के नीचे पिसता,
कभी सूक्ष्म रंध्रों से विवश निकलता,
कभी पलायन, कभी पारायण,
कभी युद्ध और कभी समर्पण ।
इस क्षण तृप्ति कुछ पा लेने की,
अगले क्षण अपरिग्रह, तिलांजलि,
कभी विस्मय कि रहस्य में छुपा कल,
और कभी लगे पूर्व नियोजित सृष्टि सकल ।
.
यह जो सतत शोध, अन्वेषण है,
जिसमें पथ, साधन, साध्य समेकित है,
यह उद्वेलन ही जीवन है,
यह अपनी ही प्रेरणा प्रेरित है ।
तर्क हो जो भी, चाहे जितना,
अंतिम प्रश्न तो है बस इतना,
‘बस कौतूहल था, छोड़ चले,
या जिया इसे, कुछ जोड़ चले ।‘
poems.bkd@gmail.com
