
जिज्ञासा के अंतिम छोर पर चलते हुए,
आधारभूत चेतना के अंतहीन धुँधलके में,
एक चिर परिचित आलोक मिला,
भ्रमित मैं, उसे न पहचान सका,
परंतु फिर साहस करके,
पूछा मैंने डरते-डरते,
‘कौन हो तुम?
क्या ईश्वर हो?’
‘हो सकता हूँ,
यदि मान तुम लो ।‘
.
उत्तर में निहित सम्भावना ने बाँध लिया,
किसी संशय के बिना,
मैंने उसे ईश्वर स्वीकार किया ।
.
उसने मेरे कंधों पर हाथ धरे,
नयनों में मेरे दृष्टि भरी,
पूछा ‘चित्त तुम्हारा मलिन क्यों है,
तेरी व्याकुलता का कारण क्या है?’
त्याग सारे असमंजस,
छोड़ सारी दुविधा और संशय,
मैंने कहा ‘भय,
कभी किसी के छूटने का भय,
कभी किसी के रूठने का भय,
मन के अंदर कुछ टूटने का भय,
भय ही उपसर्ग, भय ही प्रत्यय ।
प्रतीत होता है तुम्हारी सृष्टि में नहीं,
तुम्हारे भय में जी रहा हूँ,
कहीं तुम्हारी सृष्टि,
साक्षात भय की छाया तो नहीं ?
कदाचित हमारे भय से अपने मनोरंजन को,
तुमने हमें बनाया तो नहीं ?’
.
‘हे तनय,
मैंने तुम्हें बनाया या तुमने मुझे बनाया,
कभी और हल करेंगे इस तर्क की माया,
पहले मुझे समझने दो,
यह कौन-सा है भय,
जो तुमने अभी बताया,
निश्चय ही इसे मैंने तो नहीं बनाया,
और आज तक मनुष्य को छोड़ कर,
किसी और प्राणी में नहीं पाया ।‘
ईश्वर ने कहा सस्मित,
‘जिजीविषा की सहज चेतना,
असीमित तर्क और विवेचना,
अतिरिक्त इसके मानव को,
मैंने कुछ भी नहीं दिया,
थोड़ा चकित हूँ कि मेरे नाम पर,
तुमने यह क्या-क्या गढ़ लिया ?
मैंने तो कहा तू प्रेम कर,
हो स्नेह सिक्त और निडर ।
बाकी भ्रम जो फैला है,
है किस ज्ञान पर वह निर्भर ?’
.
‘तुम जो चाहते, मैं करता हूँ,’
मैंने कहा- ‘मैं डरता हूँ,
सच कहूँ तो केवल तुझसे ही,
तेरे भय पल-पल मरता हूँ ।
सारे जगत से लड़ सकता हूँ,
परंतु उन बेड़ियों का क्या करूँ,
जो मुझको जकड़े रहते हैं,
कि कहीं तुम्हारी आशा के विपरीत ना हो पड़ूँ ।‘
.
‘मेरी यह परिभाषा कैसे ?
मैंने कब आशा की तुझसे ?
कब कहा तुझे क्या करना है,
किस रंग से जीवन भरना है,
कब कहा मैंने मोहपाश में पड़,
अपेक्षा कर और इच्छा कर,
मात्र कर्म तुम्हारा करणीय,’
ईश्वर ने कहा, ज्यों मित्र मुखर ।
‘ताने बाने सारे तुमने बुने,
अपने विकल्प स्वयं तुमने चुने,
मुझे दोषी कह यदि संतोष तुम्हें,
तू कहता जा हम सदा सुनें ।‘
.
‘तू तो है मेरा अंश सखा,
पर जीवन तू ही जी सकता,
भय सारे तेरे जाये हैं,
परित्राण की शक्ति तू ही रखता ।‘
‘भय सारे उपजे तुझसे हो कर,
विजय मात्र तुझ पर निर्भर,
मैं चिर आलोक तेरी यात्रा का,
डर, मात्र अपने आप से डर ।‘
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