क्या कभी ऐसा भी होगा ?

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मृत्यु मात्र स्वागत आगत का,

जीवन एक उत्सव-सा होगा,

सत्य धरे करुणा भी होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

मन में निश्चय और जिज्ञासा,

चित्त कल्पना सदैव नया का,

नयन देखते क्षितिज पार हों,

विध्वंस, नव निर्माण की आशा,

भाव सकल हित का ही होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

हाथ फैलते ज्ञान ग्रहण को,

भुजा सहज स्नेह मिलन को,

पग बढ़ते सब के स्वागत को,

मस्तक नत आभार, नमन को,

मन कल्याण का ग्राही होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

विश्वास सदा संशय पर भारी,

मन सूक्ष्म संवेदना का अधिकारी,

चयन यदि समृद्धि और करुणा में,

करुणा हो विवेक की प्यारी,

हृदय स्नेह आभारी होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

सहस्र रंग हों इंद्रधनुष के,

मन अनुरंजित नव्यता से,

मन स्पंदित सखा भाव से,

हर पल सज्जित सुन्दरता से,

रमणीय काल हर भावी होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

नीति हो सम्मान की कल्पना,

पौरुष करे न्याय स्थापना,

शौर्य लीन मानव उन्मेष में,

काया करता स्वास्थ्य आराधना,

स्वत: शुचिता का संग्राही होगा,

क्या कभी ऐसा भी होगा ?

.

है महा प्रयाण का लक्ष्य यही,

विश्वास चित्त धरना ही होगा,

सृष्टि सकल आशान्वित कहती,

हाँ, होगा, ऐसा ही होगा ।

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