
तुम पूर्णता की ओर चली ।
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जीवन को जिया एक उत्सव सा,
छोड़ मोह इस नश्वर भव का,
तज़ सबको स्नेह विभोर चली।
तुम पूर्णता की ओर चली।
जीवन के अपने रहस्य अनंत,
जुड़ते नहीं प्रायः ग्रीष्म वसंत,
सब भावों को सहज ही जोड़ चली।
तुम पूर्णता की ओर चली।
जीवन को जीना कला क्या है,
तुमसे अज्ञात भला क्या है,
सबके सद्भाव बटोर चली,
तुम पूर्णता की ओर चली।
जुड़ गयी आलोक पुंज से हो,
स्मरण तुम्हारा नित्य हृदय में हो,
अनित्यया के बंधन तोड़ चली,
तुम पूर्णता की ओर चली।
