मानव का उन्मेष

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मुझे सूरज भी चाहिये और चांद भी,

और संग में झिलमाते तारे भी,

आसमान कहीं भी सूना नहीं हो,

वहाँ सफेद भी हो और स्याह भी,

और उनके अलावा इंद्रधनुष के सातों रंग भी चाहिये,

और सब के सब हों उन रोशनी की तरह,

जो आपस में मिलें तो जरूर,

पर कोई किसी को ढँक नहीं पाये,

कोई एक दूसरे पर नहीं छाये ।

.

मुझे बीते कल की कहानी भी चाहिये,

और आने वाले कल के लिये  सपने भी,

साथ ही उन पलों का स्पर्श भी,

जो अभी बीत रहे हैं ।

उन कहानियों से कुछ चुरा कर,

और उन्हें उन सपनों को मन में सजा कर,

मैं वर्तमान के पलों को गढ़ना चाह रहा हूँ,

अपने बनाये उस सम्भावित संसार की,

सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना चाह रहा हूँ,

जिससे मैं कल की आहटों को देख सकूँ,

तैयारी कर सकूँ आगंतुक के स्वागत की,

कुछ भी व्यर्थ नहीं जाये,

मैं जीवन के प्रवाह की हर बूंद को पीना चाह रहा हूँ,

कोई भी अनछुआ न जाये,

चेतना के प्रत्येक क्षण को जीना चाह रहा हूँ ।

.

यह कोरी कल्पना नहीं, मेरा प्रत्यक्ष संघर्ष है,

विविधता के संग सारे इसमें और सकल का उत्कर्ष है,

दु:साध्य हो प्रतीत पर यह प्रयत्न का जयघोष है,

स्वप्न के साकार का यह सविनय उद्घोष है,

संग्राम यह रणभूमि का उतना ही जितना मन-भूमि का,

सब समान, पर औरों की पहले हो, फिर हो मेरी स्वतंत्रता,

जय विजय की नहीं कथा यह, ना विग्रह-संश्लेष की,

मानवता के पहले प्रण की, मानव के उन्मेष की ।

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