
लोग पूछते हैं,
कि शीश झुकाने से हो क्या जाता है ?
नत प्रार्थी को क्या मिलता है,
और यह जगत क्या पाता है ?
मेरा विश्वास है,
कि जहाँ भी ऐसा करता हूँ,
वहाँ एक ईश्वर खड़ा हो जाता है ।
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मेरे नत होते ही,
स्वत: किसी का ऊपर होना स्वीकार होता है,
सद्य: कुछ जुड़ता है,
और मन अनायास ही कुछ खोता है ।
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इस खोने और पाने में,
कुछ घटता या बढ़ता नहीं है,
बस एक स्थिरता आती है,
विवेक व्यापक होने लगता है,
सारी उलझनों के होते भी,
एक सर्वग्राही भाव जगता है ।
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अपना आप छोटा नहीं,
और विशद हो जाता है,
मन अपनी परिधि को छू,
और विनत हो जाता है ।
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क्षुधा और जानने की जगती है,
जिज्ञासा का ज्वार जगता है,
अपनी चेतना पर गर्व होता है,
सहज मानवता का संस्कार जगता है ।
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परंतु नत होना,
इतना भी सरल नहीं होता है,
इसमें समर्पण, चरित्र का बल,
और बहुत ही कुशल प्रज्ञा लगती है,
स्वयम् को समझ लेने के बाद ही,
समष्टि के स्वीकार की बुद्धि जगती है ।
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अधिकार से आभार को,
संचय से रचना को,
परिणाम से प्रयत्न को,
संशय से जिज्ञासा को,
अवलोकन से परिभाषा को,
अर्थहीनता से अस्तित्व के साक्षातकार को,
और चेतना उस अपरम्पार को,
मनुष्य अनुभूत करने लगता है ।
प्राण से आत्मा की ओर बढ़ने लगता है ।
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