तुम पूर्ण हो, तुम पूर्ण रहो

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तुम पूर्ण हो, तुम पूर्ण रहो,

नहीं इच्छा तुम मुझे पूर्ण कहो,

मुझे अनुमति दो और अनुगति दो,

वरदान नहीं, बस सहमति दो ।

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पूरे की नहीं तृष्णा, आधा दो,

हिस्से का श्रम और बाधा दो,

सामर्थ्य और अभिलाषा दो,

लक्ष्य संधान की आशा दो ।

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अपने लक्ष्य की परिभाषा को,

गढ़ने को विवेक और भाषा दो,

शोध सीमाओं के पार कर सकूँ,

वह उत्कंठा, और जिज्ञासा दो ।

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मान क्षीण-ज्ञान, विनयशीलता दो,

सत्य को स्वीकारने की क्षमता दो,

आक्षेप सहने पाने की दृढ़ता दो,

अपनी निर्बलता पर निर्ममता दो ।

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मैं याचक, नित अभिनवता का,

उद्ग्रीव, सक्षम मानवता का,

मैं मोल चुकाने को प्रस्तुत,

हर सम्भावित सुन्दरता का ।

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यह उत्कर्ष भले दुर्धर्ष  सही,

संघर्ष जो भी हो उसे पाने को,

उस बिन तुम तक का मार्ग नहीं,

उसे मेरी राह तुम आने दो ।

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मैं नत हूँ, कि इस जीवन को,

गढ़ने जिसमें सब उन्नत हो,

तुम दृष्टि दो लेकर जिसको,

चिर धन्य तेरी यह रचना हो ।

poems.bkd@gmail.com

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