
तुम पूर्ण हो, तुम पूर्ण रहो,
नहीं इच्छा तुम मुझे पूर्ण कहो,
मुझे अनुमति दो और अनुगति दो,
वरदान नहीं, बस सहमति दो ।
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पूरे की नहीं तृष्णा, आधा दो,
हिस्से का श्रम और बाधा दो,
सामर्थ्य और अभिलाषा दो,
लक्ष्य संधान की आशा दो ।
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अपने लक्ष्य की परिभाषा को,
गढ़ने को विवेक और भाषा दो,
शोध सीमाओं के पार कर सकूँ,
वह उत्कंठा, और जिज्ञासा दो ।
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मान क्षीण-ज्ञान, विनयशीलता दो,
सत्य को स्वीकारने की क्षमता दो,
आक्षेप सहने पाने की दृढ़ता दो,
अपनी निर्बलता पर निर्ममता दो ।
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मैं याचक, नित अभिनवता का,
उद्ग्रीव, सक्षम मानवता का,
मैं मोल चुकाने को प्रस्तुत,
हर सम्भावित सुन्दरता का ।
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यह उत्कर्ष भले दुर्धर्ष सही,
संघर्ष जो भी हो उसे पाने को,
उस बिन तुम तक का मार्ग नहीं,
उसे मेरी राह तुम आने दो ।
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मैं नत हूँ, कि इस जीवन को,
गढ़ने जिसमें सब उन्नत हो,
तुम दृष्टि दो लेकर जिसको,
चिर धन्य तेरी यह रचना हो ।
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