एक संवाद

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ढँकते छिपाते मन के छल,

आँकते अपनी इच्छा-शक्ति के बल,

द्वार के पार पगडंडियों पर सम्हल-सम्हल,

जितनी दूर हूँ आ पाया निकल,

खोये अवसरों से भले विकल,

हैं मेरे अर्जन, मेरे प्रयास के फल ।

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बीती हार से दग्ध हृदय,

कुछ भी नहीं निश्चित, मात्र संशय,

स्वयं से छिपाता अज्ञात का भय,

निर्पेक्ष काल नहीं कभी सदय,

विपरीत परिस्थितियों में ले निर्णय,

तेरे संधान को चल पड़े पग मेरे उभय ।

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थका, रुका, टूटा, जुड़ा पर चलता चला,

महा शून्य, महा प्रलय में अपनी ही आशीष पला,

तुझसे ली चिंगारी, फिर अपनी अस्थि जला,

चलता रहा, जब सूर्य विश्राम को ढला,

नमन तुझे कोटि कोटि, पर कैसे कह दूँ भला,

मेरा कुछ नहीं, सब कुछ तेरे कृपा फला ।

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