पिता

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जितनी कम जरूरत महसूस होती है तुम्हारी,

मैं तुम्हें उतना ही अपने पास पाता हूँ,

तुम्हारी वर्जना है इसलिये प्रकट नहीं करता,

हर अभाव में खुद को बहलाता हूँ,

तुम ऐसे में मुझे कहीं छू जाते हो,

और मैं अपने को फिर से समर्थ पाता हूँ ।

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तुम्हीं ने कहा था कभी,

तुम्हीं से सुना था कभी,

अभाव मात्र वह भाव है,

जिसे तुमने जाना नहीं है अब तक,

जिसके लिये तुमने संघर्ष नहीं किया है पर्याप्त,

अपने प्रयास को पूर्णता तक परिमार्जित नहीं किया है,

संक्षेप में जिसे तुमने अर्जित नहीं किया है ।

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कितना समझा,

कब समझा,

पता नहीं,

पर अनायास ही,

कर्म सूत्र बन यह मेरे मन में बस गया था,

क्योंकि तुमने कहा था ।

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मैंने देखा हर बार,

तुम्हें जीवन को तन्मयता से सुनते,

फिर तटस्थता से अपनी राह चुनते,

साधन पर विश्वास रखते,

साध्य को अज्ञेय मान भविष्य पर छोड़ देते,

ऐसा नहीं कि इस अनिश्चितता नहीं थे तुम डरते,

फिर भी जो उचित लगता वही थे तुम करते ।

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सहज ही तुमने दिया एक ज्ञान,

अपने एक कर्ता होने का अभिमान,

चाहे जिन संशयों से हम गुजरते हैं,

हर दुविधा में निर्णय मात्र हम ही करते हैं ।

अच्छा किया कि मुझे बहलाया, पुचकारा नहीं,

सांत्वनाओं से मुझे रण से विमुख नहीं किया,

बस साथ खड़े रहे,

अपनी आशीष मुझ पर जड़े रहे,

बस मेरा संकल्प घटने नहीं दिया,

और यह मुझे यथार्थ के विषम धरातल से हटने नहीं दिया ।

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तुम्हारा स्नेह कभी मुझे,

सपनों के संसार नहीं ले गया,

नहीं कभी दी मन बहलाने को

उलझती, उलझाती भूलभुलैया,

बस अपनी विदग्धता पर फूंक मारना सिखाया,

जब कोई अवलम्ब नहीं हो सम्भव कहीं,

तो अपने अंतर्मन को धैर्य से निहारना सिखाया,

जब शीत से जमने लगे शोणित,

तो अपनी ही सांसो की गरमी से जी पाना सिखाया,

जब सारे प्रकाश संग छोड़ दें तो,

अपनी ही आंखों की लौ में पथ देख पाना बताया ।

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तुम्हारे स्नेह ने गूंथा मुझे,

इस काबिल बनाया कि आकार ले सकूँ,

और फिर तपा कर सामर्थ्य दिया,

कि बिना झुके अपना भार ले सकूँ ।

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पिता, आज भी,

सबसे कठिन क्षणों में,

तुम्हारी ही आस गहता हूँ ।

इसी लिये परमेश्वर को परम पिता कहता हूँ ।

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