
सृष्टि का हर घर्षण सहा,
मृत्यु के आतंक में भी,
‘मैं त्यागता हूँ’ नहीं कहा,
मानव मन दृढ़ता से चले चला,
समय अपनी गति बीतता रहा ।
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भले अपने निशान छोड़े,
पर अपने प्रभाव में धर ना सका
साझा अनुभव, स्मृतियाँ थीं,
ना समय रुका ना मन ही थका,
अज्ञेय समय का कुछ ज्ञात नहीं,
पर मन हर पल सीखता रहा ।
मानव मन दृढ़ता से चले चला,
समय अपनी गति बीतता रहा ।
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श्रद्धा से नत समय के सम्मुख,
आदर और विनय से अभिनत,
जिज्ञासा में डूबता तैरता,
कुछ से बचता, कुछ से लड़ता,
हर स्थिति में त्याग कर जड़ता,
भले ही दिखता लहू-लुहान हुआ,
बहुधा तो मृत-प्राण हुआ,
पर अंतत: मन हर समर जीतता रहा ।
मानव मन दृढ़ता से चले चला,
समय अपनी गति बीतता रहा ।
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अनुभव करता सूक्ष्मतम कंपन,
झंझा में भी मृदुल स्पंदन,
हाहाकार में भी अश्रुपात की ध्वनि,
हर क्षय में जीवन का दर्शन,
सहज साधे हर विद्रूप, विपर्यय,
कर सारी संभावनाओं का संचय,
विकल प्रत्येक आगंतुक पल को,
हर अज्ञात के ज्ञान को तन्मय,
भरमाती अर्थहीनता को पार्श्व ले,
जीवन रथ आगे खींचता रहा ।
मानव मन दृढ़ता से चले चला,
समय अपनी गति बीतता रहा ।
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