
लम्बी हो रही थी परछाई,
वहम हुआ कद के बढ़ने का,
दरअसल शाम हो रही थी,
और सूरज ढल रहा था ।
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शुक्रिया किसका करता,
झुलसाती धूप से राहत का,
सूरज शायद थक चला था,
और मौसम बदल रहा था ।
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तुमने क्या देखी है कहीं,
इतनी खामोश तबाही कभी,
मन के अंदर टूट हलके से,
मेरा रेत का महल रहा था ।
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यादों की तपिश का हिसाब,
सच मेरी समझ से बाहर है,
बाहर से ठिठुरता हुआ भी,
मन था कि अंदर से पिघल रहा था ।
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अपनी मुगालतों की बातें,
क्या सुनाऊँ किसी को अब मैं,
कब गिरा यह याद नहीं,
हर वक्त सम्हल रहा था ।
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सच का सामना इतना भी,
आसान नहीं होता हरदम,
लोग कर रहे थे तारीफ मेरी,
मेरे माथे पर आ बल रहा था ।
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पहली बार मुझको हुआ,
शक अपने वजूद पर क्योंकि,
मुझसे भी बेहतर कोई,
कर मेरी नकल रहा था ।
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