
यकीनन बादल हटा है,
कुहासा छँटा है,
पर इस प्रत्यक्ष घटना से आगे,
खोलते सोच के उलझे धागे,
मन के अंदर एक नयी अनुभूति मिली हैं ।
आज धूप फिर खिली है ।
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जब अनचाहे का सामना होता है,
और अंधेरा जरा ज्यादा घना होता है,
प्रबुद्ध से प्रबुद्ध मन भी,
करते स्थिति का सही आकलन भी,
थोड़ी देर को बेचैन हो उठता है,
स्वीकार कर बैठता है,
हताशा की कल्पनाओं को,
असंभव्य संभावनाओं को,
यदि अंतिम यह रात हो तो ?
यदि अब फिर से न कोई प्रभात हो तो ?
यह भी सच है कि थोड़ी देर बाद सो जाता है,
और सपनों के तिलस्म में खो जाता है ।
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और साथ ही गहनतम अंधकार में,
सारी संभावनाओं को छिन्न-भिन्न करते,
जगत के निष्ठुर व्यापार में,
जब संवेदनाएँ अस्त होती दिखती हैं,
कल की आशाएं ध्वस्त होती दिखती हैं,
एक नन्हा-सा शिशु मन की अंगुली थामे रहता है,
कोई जिद नहीं करता है, कुछ भी नहीं कहता है,
उसकी पकड़ में कोई बल नहीं होता है,
पर छूट जाये, इतना भी दुर्बल नहीं होता है,
पूछने पर दृढ़ता से मुस्कुराता है,
अपना नाम विश्वास बताता है,
अद्भुत होता है इसका साथ,
यह कभी छोड़ नहीं जाता है ।
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वह अनुभवों से थका हारा मन,
और उस निर्मल शिशु का बचपन,
दोनों संग होते हैं हमारे,
हम चाहें या न चाहें,
विवेक है उन्हीं के सहारे,
उन्हीं से खुशी, उन्हीं से आहें ।
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अपनी जिंदगी के अभिभावक,
किसकी कितनी सुनते हैं,
किधर कितना झुकते हैं,
और अंत में किसे चुनते हैं,
होता है निर्धारक ।
हम अपने अभिभावक ।
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