
आगे बढ़ने से अधिक, आगे दिखने की परवाह हो,
अपनी जीत से अधिक दूसरों की हार की चाह हो,
अपने से अधिक आसान दिखती दूसरों की राह हो,
संवेदनाओं का सतत अपनी ही ओर प्रवाह हो,
यदि विवेक समेट अपने अंदर झाँक पायेगा,
तो अपना प्रतिबिंब तुझे टेढ़ा नजर आयेगा ।
क्षीण होता जा रहा हो सब के कल्याण में विश्वास,
हर हाल में सही लगे अपने मन में जगती प्यास,
अपने से छोटा लगने लगे औरों के ऊपर के आकाश,
न्याय से अधिक सुंदर लगें तिरछे तर्कों के विन्यास,
जरा ठहर, क्या तुझसे पीछे मुड़ देखना हो पायेगा,
तुम्हारा चेहरा कई सारे सवाल लिये नजर आयेगा ।
कौतूहल और जिज्ञासा लगें वृथा के भाव,
यात्रा से अधिक रुचिकर लगने लगे पड़ाव,
उन्मुक्ति भयभीत करे, हो बंधन से जुड़ाव,
स्थिरता आकर्षित करे, व्यर्थ लगे बहाव,
इन संकेतों के अर्थ यदि समझ पाओ,
अब भी सम्भव है कि फिर से तुम बदल जाओ ।
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