विकल्प

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बँधी लीक से पहला विचलन,

था मेरा निर्णय या भव की माया,

क्यों उलझूँ इस विश्लेषण में,

प्रत्यक्ष हूँ प्रस्तुत, जो हो पाया,

चाहे जिस भी राह चला मैं,

संताप नहीं क्या खो आया,

संतोष यही कि हर बाधा से,

कुंठा मुक्त हो लड़ पाया ।

.

यह स्थल और यह पल मेरा,

अपनी हर गति का निर्माता मैं,

आराध्य कृतज्ञ तेरी करुणा का,

नहीं उसके बिना कुछ कर पाता मैं,

पर सारा जीवन कर्म बस मेरा,

यह कहते नहीं अघाता मैं,

और अंश हूँ तेरा स्वयं को मानता,

और इससे भी नहीं लजाता मैं ।

.

विकल्प है सम्मुख हर पल, हर क्षण,

मतिभ्रम में कहते हम विचलन,

जीवन जब भी प्रस्तुत करता,

कोई आड़ोलन या स्पंदन,

वस्तुत: अवसर दे करता प्रेरित,

करने जीवन का अभिनंदन,

निर्माण करें हम अपने जग का,

निज हाथों से गढ़ लें जीवन ।

poem.bkd@gmail.com

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