
इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे,
मैं भ्रमित हुआ कहीं देख रहा था,
मुझे पास खड़े तुम निहार रहे थे ।
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मैं कल की चिंता में खोया,
तुम आज के कौतुक दिखा रहे थे,
भव के भय से पग थे दुर्बल,
तुम ज्ञान धैर्य के सिखा रहे थे ।
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किसी मार्ग पर भटक रहा मैं,
खोज रहा था कोई परिचित छाया,
विपरीत मेरी व्याकुलता के तुम,
बता रहे थे यथार्थ की माया ।
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मैं संधि और विग्रह में उलझा था,
सूक्ष्म विवेचन की थी आशा,
तुम अपने ही मन की करते,
लिख दी अनिश्चितता की परिभाषा ।
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अज्ञेय, तुझे आराध्य मान कर,
मान चला था पक्षधर निज का,
पर पक्ष यदि मेरा धरते तो, कौन
निर्पेक्ष विमर्शक होता मेरा ?
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हित अनहित की कथा कहूँ क्या,
तुम कर मेरा संचार रहे थे,
मैं ने तुमको फिर देखा,
इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे ।
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