मैं ने तुमको फिर देखा

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मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे,

मैं भ्रमित हुआ कहीं देख रहा था,

मुझे पास खड़े तुम निहार रहे थे ।

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मैं कल की चिंता में खोया,

तुम आज के कौतुक दिखा रहे थे,

भव के भय से पग थे दुर्बल,

तुम ज्ञान धैर्य के सिखा रहे थे ।

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किसी मार्ग पर भटक रहा मैं,

खोज रहा था कोई परिचित छाया,

विपरीत मेरी व्याकुलता के तुम,

बता रहे थे यथार्थ की माया ।

.

मैं संधि और विग्रह में उलझा था,

सूक्ष्म विवेचन की थी आशा,

तुम अपने ही मन की करते,

लिख दी अनिश्चितता की परिभाषा ।

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अज्ञेय, तुझे आराध्य मान कर,

मान चला था पक्षधर निज का,

पर पक्ष यदि मेरा धरते तो, कौन

निर्पेक्ष विमर्शक होता मेरा ?

.

हित अनहित की कथा कहूँ क्या,

तुम कर मेरा संचार रहे थे,

मैं ने तुमको फिर देखा,

इस बार तुम मुझे पुकार रहे थे ।

poem.bkd@gmail.com

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