
क्यों भ्रमित मैं ऐसे हो रहा हूँ,
दिशा ज्ञान क्यों खो रहा हूँ,
किन वस्तुओं को दूर कर रहा,
और किन को संजो रहा हूँ ?
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जीवन निर्धारण नीति कर रही,
न्याय लुप्त विश्लेषण में,
घट ज्ञान का भरते-भरते,
विवेक भ्रमित अन्वीक्षण में ?
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सृजन के संवेग को सम्हालता,
क्यों कर्म सदा विचलित होता,
हित और अपहित की व्याख्या में,
क्यों बल-कौशल बाधित होता ?
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क्यों जीवन की रण भूमि में,
स्याह रंग अधिक दिखते हैं,
स्वेद और शोणित घुल मिल कर,
पीड़ा की गाथा क्यों लिखते हैं ?
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क्यों कल्याण शोध में चलते पग,
हो वशीभूत किसी सम्मोहन से,
होते मात्र क्षण भर को विचलित,
और हम दूर लक्ष्य आरोहन से ।
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मन की विधियाँ हैं दुरूह,
पर मन की क्रिया असंभव-सी,
रचना सब कुछ सुंदर है लक्ष्य, पर
चाहे कीर्ति, मान और वैभव भी ।
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शोध सृष्टि की और अमरता,
और छूना हम चाहें आकाश,
परंतु पल-पल कसें कसौटी,
अपनी ही आस्था और विश्वास ।
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उन्मुक्तता वह मूल बिंदु है,
चेतना जहाँ से पाता विस्तार,
पर उद्देश्य यदि नहीं व्यापक तो,
करते मलिन इनको विकार ।
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भुज की शक्ति या विचार की,
हैं मात्र ऊर्जा और उपादान,
नियंत्रक सब के तुम ही चेतन,
अंश परम के, विधाता के वरदान ।
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