अंश परम के

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क्यों भ्रमित मैं ऐसे हो रहा हूँ,

दिशा ज्ञान क्यों खो रहा हूँ,

किन वस्तुओं को दूर कर रहा,

और किन को संजो रहा हूँ ?

.

जीवन निर्धारण नीति कर रही,

न्याय लुप्त विश्लेषण में,                

घट ज्ञान का भरते-भरते,

विवेक भ्रमित अन्वीक्षण में ?

.

सृजन के संवेग को सम्हालता,

क्यों कर्म सदा विचलित होता,

हित और अपहित की व्याख्या में,

क्यों बल-कौशल बाधित होता ?

.

क्यों जीवन की रण भूमि में,

स्याह रंग अधिक दिखते हैं,

स्वेद और शोणित घुल मिल कर,

पीड़ा की गाथा क्यों लिखते हैं ?

.

क्यों कल्याण शोध में चलते पग,

हो वशीभूत किसी सम्मोहन से,

होते मात्र क्षण भर को विचलित,

और हम दूर लक्ष्य आरोहन से ।

.

मन की विधियाँ हैं दुरूह,

पर मन की क्रिया असंभव-सी,

रचना सब कुछ सुंदर है लक्ष्य, पर

चाहे कीर्ति, मान और वैभव भी ।

.

शोध सृष्टि की और अमरता,

और छूना हम चाहें आकाश,

परंतु पल-पल कसें कसौटी,

अपनी ही आस्था और विश्वास ।

.

उन्मुक्तता वह मूल बिंदु है,

चेतना जहाँ से पाता विस्तार,

पर उद्देश्य यदि नहीं व्यापक तो,

करते मलिन इनको विकार ।

.

भुज की शक्ति या विचार की,

हैं मात्र ऊर्जा और उपादान,

नियंत्रक सब के तुम ही चेतन,

अंश परम के, विधाता के वरदान ।  

Contact: poems.bkd@gmail.com

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