अंश तुम्हारा

Photo by Oliver Sju00f6stru00f6m on Pexels.com

तुमने मुझको मन दिया,

हृदय और स्पंदन दिया,

भाव दिये, संवेदना दी,

जुड़ पाने की भावना दी,

पैरों तले आधार दिया,

स्वप्नों को गगन का विस्तार दिया,

गति और नियंत्रण संग-संग दिया,

गहने को अपना अवलम्ब दिया,

चेतना दी, अनुराग दिया,

ध्वनि, प्रकाश और राग दिया,

जीवन के अद्भुत रंग दिये,

असीमित उल्लास, उमंग दिये ।

.

बुद्धि दी, विवेक दिया,

संयम और अतिरेक दिया,

चिंतन की शक्ति और तर्क दिया,

तप, साधना का सम्पर्क दिया,

अपने ही विश्लेषण की शक्ति दी,

प्रेम दिया और भक्ति दी,

जिज्ञासा का आकाश दिया,

रचनाधर्मिता और प्रयास दिया,

नव चिंतन और आविष्कार दिया,

नीति, न्याय और संस्कार दिया,

अपने अंक का पाश दिया,

चेतना का प्रकाश दिया,

समाज दिया, संयास दिया,

और अपने ऊपर विश्वास दिया ।

.

आश्चर्य, कहाँ छल को जाना,

शक्ति भौतिक बल को माना,

कैसे पाये तृष्णा के विकार,

क्यों रुचिकर लगने लगा अहंकार,

घर से चला अच्छा बनने पर,

बड़ा बनना क्यों लगा महत्तर,

आगे बढ़ना कर्तव्य परम था,

क्यों पीछे छोड़ना स्वभाव बन गया,

मिथ्या क्यों हो गया परिष्कार,

झुकने लगी नैतिकता बारम्बार,

सारा अस्तित्व अर्थहीन और निराधार,

स्वीकार्य हुआ कैसे मन का यह अंधकार,

अब अच्छा हूँ यह कह नहीं सकता,

मन घिरती असहज व्याकुलता,

पर मन अबोध शिशु एक अभी भी गाता,

शेष है आशा, कहता जाता ।

.

असहनीय है यह भाव पराभव,

पर विश्वास कि तुम हो तो है सम्भव,

दोष कहाँ ये घर कर आये,

क्यों हम उन्हें पहचान न पाये,

पर प्रकाश एक अब भी है जलता,

तेरी करुणा में विश्वास एक पलता,

दे दो निवारण और समाधान,

समेट पाऊँ बिखरा स्वाभिमान,

अंश तुम्हारा होने का,

रख पाऊँ फिर से सम्मान ।

.

.

.

poems.bkd@gmail.com

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment