शाम

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शामें भी अजीब होती हैं,

जीने की शर्तों को पूरा करने में,

दिन भर का थका-माँदा  तन,

दो पल बेफिक्री के गुजार कर,

घर लौटना चाहता है,

अपनी चारपाई पर लेट पाने को,

चिर परिचित महक की आगोश में,

बेसुध हो सो जाने को,

कि अचानक,

दिन भर की उलझनें भी प्यारी लगने लगती है,

थकान एक मीठे दर्द-सा महसूस होती है,

जिससे कोई शिकायत नहीं होती है,

बल्कि उस पर गर्व होता है,

क्योंकि वही तो दिन भर की कमाई होती है,

बाकी तो सब खर्च हो चुका होता है,

दिन की रोशनी की तरह,

और बेचारा आदमी,

इस उलझन में,

कि रोजमर्रा का सुकून बेहतर है,

या फिर से एक बार लापरवाही में भटकना,

और फिर वह अपने अंदर ही बँट जाता है,

अंत में कुछ कल के लिये छोड़,

आज की बाहों में सिमट जाता है ।

.

शामें सचमुच अजीब होती हैं,

घर जाना एक साथ

बुलावा भी लगता है,

और छलावा भी,

बंधन भी लगता है,

और कल के लिये ईंधन भी,

कुछ ऐसा जो बांध के रख सकता है,

सदा-सदा के लिये,

अपने माया जाल में,

अपने हैरतअंगेज सवाल में,

आने वाले कल के सम्भावित प्रस्फुटन में,

और बीते कल के असहज सम्मोहन में ।

मन तय नहीं कर पाता,

कि इस आकर्षण को स्वीकार करे,

और इसमें समा जाये,

या बची हुई ऊर्जा को लगा दे,

ढूँढ ले एक जगह जो सारे आकर्षण से परे हो,

और वहाँ चला जाये।

.

दोनों ही स्थिति,

चाहे जितनी भी अलग हों,

कोई फर्क नहीं पड़ता दुनिया के व्यापार में,

कुछ उसी तरह जैसे,

एक दिन की शाम हो, या जिन्दगी की,

बहुत कम अंतर होता है,

मन में उठती भावनाओं के ज्वार में ।

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