मन के उच्छवास

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लहरों की लालिमा,

नभ में बिखरे रंगों से नहीं,

बहती धारा के उमंगों से नहीं,

शाम के सूरज की किरणों से खेलती,

हवा के छूने से उठती जल के तरंगों से बनी ।

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मन के उच्छवास,

मात्र परिवेश पर नियंत्रण या अधिकार से नहीं,

जीवन की गति, नियति और आधार से नहीं,

अवस्था चित्त के आनंद की सदा ही,

अपेक्षा और प्रतिफल के संतुलनऔर स्वीकार से बनी ।

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नीरवता चारों ओर,

अन्यमनस्क मन, भाव विहीन,

असह्य शिथिलता, कुछ भी ना नवीन,

सहसा एक विस्मृत स्मरण कौंध कर,

कर जाता चित्त को आनंद में आसीन ।

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मन के आनंद,

प्राप्त लक्ष्य की उन्मत्त भावनाओं  से परे हैं,

कल की सुखद परिकल्पनाओं से परे हैं,

शायद मन का अनुरंजन हर पल में छुपी,

संभावनाओं के असीमित रहस्य से भरे हैं ।

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