
बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,
समय ने कुछ कहा,
और चला गया ।
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बहुत ही मृदुल पल था,
स्पंदन विहीन, उत्तेजना से परे,
सारा अस्तित्व कहता रहा,
ऐसा ही ठहर, कुछ और पहर,
ना जाने क्यों मैं सजग हो,
उसमें अर्थ की संभावना ढूँढने लगा ।
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वह विस्तार था या गति थी,
अर्धचेतना के धुँधलके में,
तय नहीं कर पाया,
चल पड़ा मैं पीछे-पीछे,
अपने ही सम्मोहन में ।
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बहुत काल बीते,
समझ नहीं पाया,
यह कोई यात्रा थी,
या अकारण एक प्रवाह,
पर गंतव्य के अज्ञान में,
कितनी सहज थी जीवन की गति ।
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पथ की पगडंडियाँ थीं,
या कौतूहल के भरमाते सुरंग,
किन राहों से गुजरा समय,
कभी संग ले, कभी अपने गर्भ में धर,
बार-बार सोता जगता रहा,
अपनी ही वेदना की हिमशिला पर ।
चरम सार्थकता और अर्थहीनता के बीच,
एक पतली लकीर नहीं,
पूरा जीवन ही होता है,
बहुत देर चलो तो,
वहीं पहुँच जाते हो जहाँ से चले थे ।
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पर चलने की क्या माया है,
कि गति और मति एक दूसरे को,
समझ नहीं पाते हैं,
उलझ-उलझ सुलझाते और
सुलझ-सुलझ उलझाते हैं ।
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एक पल को जब सब कुछ छोड़ दिया,
मन की गति को अंदर की ओर मोड़ लिया,
तो स्पष्ट हुआ,
कि बोझिल पलकों पर ठहरते हुए,
समय ने क्या कहा,
उसने कहा,
अभी कुछ पल सब कुछ ठहरने दे,
मूंद ले नयन और अपने को,
अनंत विस्तार में खो ले,
बहुत चल चुका मतिभ्रम में,
अब थोड़ी देर सो ले,
और फिर वह चला गया ।
