
संवेदनाएँ जब स्थूल होने लगती हैं,
अधिक जगह लेती हैं,
मन थोड़े से ही भर जाता है,
और कोई समझाता है,
चले चलो, ऐसा ही होता आया है,
इससे अधिक किसी ने नहीं पाया है ।
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संवेदनाएँ जब आकार लेने लगती हैं,
हृदय में समा नहीं पाती हैं,
इसके जो हिस्से बाहर पड़े रहते हैं,
किसी आकलन में हम उन्हें अनावश्यक कहते हैं,
फिर उन्हें काट कर अलग कर देते हैं,
और एक जरूरी काम पूरा हुआ मान लेते हैं ।
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संवेदनाएँ जब विषम होने लगती है,
जहाँ से भी गुजरती है,
अपने खुरदरेपन से निशान छोड़ती जाती हैं,
और धीरे-धीरे हम उनके सम्पर्क से दूर होने लगते है,
और अपने को समझाने के लिये मन में,
उनकी जगह नये-नये विचार बोने लगते हैं ।
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संवेदनाएँ जब असहज होने लगती हैं,
रंग बदलती हुए जीती हैं,
और अपने अर्थ खोने लगती है,
फिर तो कई बार,
उन्हें हम खुद नहीं पहचान पाते हैं,
और किसी मोड़ पर अचानक उनसे सामना हो जाये,
तो बड़ी सफाई से नजर चुरा कर आगे निकल जाते हैं ।
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प्रश्न यह नहीं कि संवेदनाएँ,
स्थूल क्यों हो जाते हैं,
आकार में ढलने की उनमें प्रवृत्ति कहाँ से आती है,
आरम्भ में इतने स्निग्ध होते हैं,
तो इतने विषम और रुक्ष क्यों हो जाते हैं,
और अंतत: कौन भरता इनमें वह असहजता,
जिसके होने का हमें पता भी नहीं चलता ।
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स्वाभाविक है,
क्यों कि संवेदनाएँ भी उसी परिवेश में पलती हैं,
जो हमारे चारों ओर हैं,
हमारे संग वह भी नये-नये साँचे में ढलती है ।
प्रश्न सनातन यह है कि किस यत्न से हमने इन्हें पाला है,
हमारा बदलना तो तय था,
कितनी शुचिता से हमने संवेदनाओं को सम्हाला है।
