बीते हुए पड़ाव

Photo by eberhard grossgasteiger on Pexels.com

बिछड़े संगी, भूली यादें, छूट चुका वह गाँव,

अनगढ़ जीवन, अटपट बातें, दौड़ना नंगे पाँव,

फिर नये देश में, नये भेष से नये-नये जुड़ाव,

बढ़ते जाने की धुन में खुद ही जुड़ते गये पड़ाव ।

.

उन में से कई पड़ाव मुझे अक्सर पुकारते हैं ।

जैसे कोई कहता हो,

चलो कुछ वक्त फिर से वहाँ गुजारते हैं ।

हिचकिचा के मगर मैं ठहर जाता हूँ,

इसमें कहीं कुछ गलत तो नहीं, कर तय नहीं पाता हूँ ।

और बिना इजाजत कुछ करने की आदत जो खो डाली है,

लूँ किससे इजाजत, यह समझ नहीं पाता हूँ ।

कहीं इनके मतलब कोई बुलाने के अलावा तो नहीं,

मासूम पुकार ही हैं, इनमें कोई छलावा तो नहीं ?

.

वक्त की रफ्तार, कहते हैं, आगे ही चलती है,

पर जिंदगी तो बहुत सारे रंग बदलती है,

बनाती रहती है अपने साँचे, फिर उन्हीं में ढलती है,

कई बार बीते दिनों में भी पलती है ।

.

जो हमें बताया गया है,

कि जिंदगी आगे बढ़ने का ही नाम है,

सच है, पर अधूरा,

बड़ा सच तो यह है कि कोई नहीं जानता,

क्या है इसका सच पूरा,

और सिर्फ होने के अलावा,

क्या इसका कोई काम है ?

.

इसे नाम भी हम ही देते हैं,

और मतलब भी हम ही,

कभी पूरा जान नहीं पाते,

पर तय करते हैं क्या गलत है क्या सही ।

.

हम इसमें आजादी ढूँढ़ते हैं,

जबकि आजादी जिंदगी को चाहिये होती है,

बढ़ने की, सिमटने की,

दूर होने की, लिपटने की,

बार-बार गिर कर उठने की, आगे बढ़ने की,

बार-बार पीछे मुड़ कर भूली इबारतों को फिर से पढ़ने की ।

.

सो बीते पड़ाव जो मुझे पुकारते हैं,

मुझे रोकते नहीं,

मेरी उलझनों सँवारते हैं,

जिन्दगी को बचाते हैं महज एक रफ्तार बनने से,

और बड़ी सफाई से अनदेखे भँवरों के पार उतारते हैं ।

बीता कुछ भी खत्म नहीं होता,

बल्कि जुड़ जाता है,

जिन्दगी का हासिल,

उसी से तो समझ में आता है ।

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment