अपने अपने महाभारत

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समर हैं सब के अपने-अपने,

अपनी नीति, अपना इतिहास,

नियम, न्याय और दण्ड हैं अपने,

अपने संशय और विश्वास ।

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युद्ध कौशल, पौरुष प्रखर,

अंबा, अंबालिका के अपवाद,

भूला ये सब और शरशैया ,

पर सदा भीष्म प्रतिज्ञा याद ।

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कहे सूर्य पुत्र या सूत पुत्र,

रहा जीवन का असमंजस,

कालांतर भी मिटा न पाया,

माता कुंती की पीड़ा, अपयश ।

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द्रोण, द्रुपद, और धृष्टद्युम्न,

हों महा समर की मुख्य कथा,

एकलव्य, अश्वत्थामा किंतु,

विषय रहस्य के, प्रत्यक्ष व्यथा ।

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द्यूत क्रीड़ा और लाक्षागृह,

मायावी इंद्रप्रस्थ के भवन,

याद नहीं, कोई भूल न पाया,

एक वधु का चीर हरण ।

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छल, कौशल, युक्ति, शौर्य की,

करती चकाचौंध गाथाएँ,

पर किशोर अभिमन्यु का वध,

शूल हृदय का, चैन न दे ।

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संदर्भ बिना असंगत लगते,

सारे हठ, प्रण और विद्वेष,

सुना कहीं शोणित से बंधते,

कभी किसी रानी के केश ।

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कितने भिन्न प्रभाव हैं सब पर,

यद्यपि एक रणभेरी की धुन,

कर्ण सदा ही अपने-अपने,

सब के अपने-अपने अर्जुन ।

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