गति चेतना

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परिधि पर चलते-चलते,

अन्यमनस्क-सा हो रहा था,

कौशल बढ़ रहा था सम्भवत:,

अपना अर्थ परंतु खो रहा था ।

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कारण कोई चेतन प्रयास,

या था अवचेतन की अकर्मण्यता ?

कुछ और नहीं हुआ ज्ञात,

तो इसे नाम प्रारब्ध का दे दिया ।

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निर्विघ्न और निर्विवाद,

शाश्वत आवर्ती यह सम गति,

शांत, शिथिल और सम्मोहक,

पर होती मात्र जड़ पिंडों की ।

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जो भी थे आकर्षण इसके,

हुआ नहीं स्वीकार्य कभी,

उस मोह पाश के विघटन की,

कथा वहीं से शुरू हुई ।

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सहज प्रयास कि सिद्ध करूँ,

चेतना का मैं धारक हूँ,

महा यंत्र का एक अंग नहीं,

कर्ता हूँ, और कारक हूँ ।

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पर पथ विचलन के हेतु,

आवश्यक एक नये बल को,

अंदर ही उत्पन्न करूँ,

या प्राप्त किसी संधान से हो ।

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ऐसे ही क्षण ऊपर देखा,

याचना की, आभार लिया,

कुछ पाने के पहले देने का,

था यह मन का व्यापार नया ।

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विस्मयकारी यज्ञ अनूठा,

बिना ज्ञान सम्पन्न हुआ,

आहूति थी फल के इच्छा की,

सहज जिज्ञासा थी समिधा ।

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पश्चात हवन एक बल ने मुझको,

सक्षमता का स्पर्श दिया,

तोड़ चक्रव्यूह परिधि का,

मैंने चेतना का सम्मान किया ।

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जड़ता से सजग चेतना की,

यात्रा ने अद्भुत चमत्कार किया,

सम्मोहन को विघटित कर,

मन में विश्वास और आभार दिया ।

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