झंकार

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चारों ओर के अनवरत कोलाहल में ही कहीं,

किसी आवेश के बस मन में छुपा एक तार झंकृत हुआ,

 चेतना का समस्त क्षितिज,

जैसे एक नयी आभा से अलंकृत हुआ,

अचंभित हो स्वाभाविक संशय से घिरने लगा,

सहसा,

मन में कोई द्वंद्व नहीं था,

था एक सरल आभासस जगा,

कि कर के जुड़ने से,

और शीश के झुकने से,

आँखों में नमी आती है,

धड़कनों के वेग में कमी आती है ।

.

सत्य को चाहने की शक्ति आती है,

ओझल सुन्दरता दिखने लग जाती है ।

मुझसे सहज जीवन का निर्वाह जो होता है,

हृदय में उस अदृश्य द्रव का प्रवाह जो होता है,

जिससे सारे रुग्ण तंतु सामान्य हो जाते हैं,

विकटतम पराभव की अनुभूति को सह पाते हैं,

गहनतम संघर्ष से नहीं मिलता,

किसी महान मनीषि के परामर्श से नहीं मिलता,

जो मिलता है समर्पण में, जिज्ञासा की व्यथा में,

बहुधा करुणा में, करबद्ध, नत शीश अवस्था में ।

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विचारों की व्यापकता का पहला अनुमान,

अनंत के संभव होने का स्पष्ट प्रमाण,

विस्मयों से भरा सूक्ष्मता का ज्ञान,

मन के उत्तुंग शिखर और धू धू जलते श्मशान,

इन सब की अनुभूति, प्रत्यक्ष या अन्यथा,

तभी मिला जब नयन मुंदे थे, शीश झुका था ।

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मानता हूँ,

यदि इतने पर ही छोड़ दूँ,

तो लगेगा यह कथानक अधूरा,

पर किसी अनुभूति को आत्मसात करना,

क्या होता कभी है पूरा ?

उन्हें जीना अभी शेष है,

जीवन के हर झंकार में,

कुछ न कुछ विशेष है ।

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