बंधन-उन्मुक्ति

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बंधनों के टूटने से,

बंधनों के छूटने से,

स्वच्छंदता की तरंगें बनती हैं,

जो, आगे चलकर, जीवन के नये आयाम जनती हैं ।

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जिस जगह बंधे होते हैं बंधन के तंतु,

बंधन के हस्ताक्षर वहाँ परंतु,

सदा के लिये ठहर जाते हैं,

कोई भी प्रयास उन्हें मिटा नहीं पाते हैं ।

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ये बंधन के स्मृति चिन्ह,

साक्षी होते हैं सदा के लिये,

उन सारे पथ और मोड़ के,

और उन मृगमरीचिका के,

जिन से हो कर हम जिये ।

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बंधन हमें जड़ से जोड़ते,

जड़ नहीं करते,

हमारे पिछला पता होते हैं,

जिसके स्मरण से हम अज्ञात से नहीं डरते ।

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हर बंधन को ज्ञात है,

कि वह टूटने के लिये ही बना है,

और यह भी कि हर नया गंतव्य,

उसी की एक नयी परिकल्पना है ।

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बंधन से उन्मुक्ति,

सदा बंधन की ऋणी है,

अपनी संतति को आगे बढ़ाती,

बंधन उन्मुक्ति की जननी है ।

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शब्दों में, छंदों में,

सदा हम ऐसा कहने से बचते हैं,

पर बंधन और उसका टूटना,

जीवन को दोनों ही मिलकर रचते हैं ।

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