कुछ बिम्ब

Photo by beyza u00e7ekiu00e7 on Pexels.com

भोर का सपना,

थोड़ा याद, थोड़ा भूला हुआ,

जैसे पिछले जनम से कोई आवाज दे,

अगले जनम का कोई संदेश देता हुआ ।

.

दिन में दिखता चांद,

जैसे कोई भटका हुआ राही,

डरता हुआ कि कहीं फिर से न हो,

वही तारों की भीड़ और रात की स्याही ।

.

मंदिर में जलता अंतिम दिया,

जैसे कहता हो समय से ‘थोड़ा और धीरे’,

सुबह होते ही कोई बुझा देगा,

सूरज की ओर आभार से बार-बार नत होते ।

.

फूल की पंखुड़ी पर,

उगती पहली ओस की बूंद,

जैसे हृदय के अछूते कोने में,

करुणा और विश्वास जन्म ले रहे साथ-साथ,

जीवन के सुंदर होने में ।

.

मेघ के कोमल गात से,

सहसा चमकी वज्र की रेखा,

मानव की आकांक्षा की सीमा को,

प्रकृति ने अभी कहाँ है देखा ?

.

इंद्रधनुष  का वलय खिंचा नभ,

कैसे, क्यों, किसका? अज्ञात,

जैसे सारी सुंदरता पहनकर,

सृष्टि निकली सद्य: स्नात ।

Published by

Unknown's avatar

Leave a comment