
भोर का सपना,
थोड़ा याद, थोड़ा भूला हुआ,
जैसे पिछले जनम से कोई आवाज दे,
अगले जनम का कोई संदेश देता हुआ ।
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दिन में दिखता चांद,
जैसे कोई भटका हुआ राही,
डरता हुआ कि कहीं फिर से न हो,
वही तारों की भीड़ और रात की स्याही ।
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मंदिर में जलता अंतिम दिया,
जैसे कहता हो समय से ‘थोड़ा और धीरे’,
सुबह होते ही कोई बुझा देगा,
सूरज की ओर आभार से बार-बार नत होते ।
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फूल की पंखुड़ी पर,
उगती पहली ओस की बूंद,
जैसे हृदय के अछूते कोने में,
करुणा और विश्वास जन्म ले रहे साथ-साथ,
जीवन के सुंदर होने में ।
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मेघ के कोमल गात से,
सहसा चमकी वज्र की रेखा,
मानव की आकांक्षा की सीमा को,
प्रकृति ने अभी कहाँ है देखा ?
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इंद्रधनुष का वलय खिंचा नभ,
कैसे, क्यों, किसका? अज्ञात,
जैसे सारी सुंदरता पहनकर,
सृष्टि निकली सद्य: स्नात ।
