हर क्षण सहज आनंद है

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जब हम आज में कम होते हैं,

बीते दिनों की स्मृतियों में भटकते, खोते हैं,

निश्चय ही यह कहीं से आता एक संदेश है,

कि कम महत्वपूर्ण अब परिवेश है,

अपने अंदर में जो भी समाहित है,

ज्ञात नहीं कितना उचित या अनुचित है,

उनको सजाने का समय आ गया है,

अब स्वयं को पाने का समय आ गया है ।

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जब संग्रह से कुछ न बढ़ता प्रतीत हो,

दे देने से लगता न कुछ व्यतीत हो,

व्यर्थ लगने लगे बीते दिनों की तृष्णा,

मन आगे बढ़ता चले बिना आलोचना,

चलना आवश्यक लगे, दौड़ना अनिवार्य न हो,

आनंद से अधिक कभी धन-धान्यता स्वीकार्य न हो,

तो ज्ञात हो कि जीवन के कुछ अवगुंठन खुल रहे हैं,

कठिन कवच-आवरण इस योद्धा के हो मृदुल रहे हैं ।

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अपेक्षा जब अपना अर्थ खोने लगे,

करुणा क्षमा के बीज बोने लगे,

अपने दंभों पर लज्जा आये, पश्चाताप हो,

आकांक्षाओं को अंदर समेटना अपने आप हो,

सृष्टि में अपना स्थल बनाना न हो संघर्ष का आधार,

हर प्रयत्न इस ओर कि कैसे स्थित प्रतीक का हो परिष्कार,

जब परिमार्जन अर्जन से अधिक रुचिकर लगने लगे,

सम्भवत: आप हैं उचित दिशा में चलने लगे ।

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भोर की तरह ही सुंदर हो सकते है संध्या के परिदृश्य भी,

एक वय में हम अपने गुरु, हम ही अपने शिष्य भी,

क्षितिज के समीप होते, बस उसमें ही समाना चाहते हों,

सामर्थ्य की लालसा नहीं, अब अर्थ पाना चाहते हों,

जीवन अब सरस, सुमधुर, शाश्वत छंद हो,

संधान बस आनंद का, हर क्षण सहज आनंद हो ।

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