हर पल लगने लगा नया था

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अनजानी राहों पर ठिठक-ठिठक कर,

राह पूछते, हिचक-हिचक कर,

कौतूहल था, और भय भी था,

मन में हल्का संशय भी था,

ज्ञान नहीं था, मान क्या करता,

कुछ होने का दम्भ क्या भरता,

विस्मय से देखता अनंत प्रसार मैं,

बढ़ता ही चला, हो निर्विकार मैं ।

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जगह नयी थी, देश नया था,

आगंतुक होना अच्छा लगता था,

खुले-खुले सपने लगते थे,

कोई न बंधन, सब अपने लगते थे,

था मन पर कोई भार न लगता,

किसी से छुपने का विचार न जगता,

जीवन बहुत सहज लगता था,

स्फूर्त और सजग लगता था ।

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समय कौन-सा, वह जादू क्या था,

पर इससे भी था फर्क क्या पड़ता,

पता नहीं प्रयोजन क्या था,

पर भटकने में एक सम्मोहन-सा था ।

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जी करता था चलता जाऊँ,

इस सुलझे पल को ना उलझाऊँ,

बाकी सब आलोचना है,

जीवन ऐसा ही होने को बना है,

जीवन इस पल के नाम बना दूँ,

बस यहीं इस पर पूर्ण विराम लगा दूँ  ।

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सारी शंकाओं को परे हटा कर,

मन ने ढूँढ लिया था उत्तर,

सहज सरलता कभी मत खोना,

यायावर, विचलित मत होना,

आरोप जटिलता दूर न करते,

दिकभ्रम कभी आशा नहीं भरते,

संधान नव्यता का एक बल है,

जिज्ञासा सदैव निर्मल है,

बिन अपेक्षा का हर उद्यम,

करता सदैव थोड़ा और सक्षम,

विश्वास सहज हर भय हर लेता,

अपने निश्चय से डिगने नहीं देता ।

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जीवन के आयाम बहुत हैं,

हर प्रयास के परिणाम बहुत हैं,

कहीं धवल तो कहीं श्याम है,

कहीं तिरस्कार तो कहीं प्रणाम है,

सुंदर मात्र विशद विविधता ,

‘मन वांछित जीवन’ मरीचिका,

चित को बाल सुलभ किया तो,

लाभ-हानि से दूर जिया तो,

जीवन लगने लगती क्रीड़ा,

थोड़ी सह्य लगती हर पीड़ा ।

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जिये जीवन के जो भी क्षण,

दर्शक बन, आगंतुक बन,

जब याचक सा व्यवहार किया,

जिज्ञासा को मौलिक संस्कार किया,

जो मेरा था देय, दिया,

मधु-गरल सम भाव पिया,

ऐसे जीकर जब आँखें खोली,

भरी-भरी थी मेरी झोली ।

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पग तल के आधार वहाँ थे,

समता के अधिकार वहाँ थे,

आकांक्षा थी, अभिलाषा थी,

जीवन-उद्देश्य की परिभाषा थी,

भाव समर्पण का मधुर मदिर,

चित्त को कर गया स्थिर,

भय अब उर से निकल गया था,

हर पल लगने लगा नया था

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