
दीवार, छत, द्वार, दहलीज,
मन घर भी है, मन आंगन भी,
उन्मुक्त गगन का सपना भी है,
और उन सपनों का बंधन भी ।
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पग के नीचे सौम्य धरातल,
ऊपर स्वच्छंद उन्मुक्त गगन,
कैलाश, कुरुक्षेत्र, वैतरणी,
तप, हवन, य़ज्ञ और चंदन भी ।
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स्मित हास और अट्टहास भी,
कभी संदेश, कभी संवाद,
एक साथ सब मन के अंदर,
अश्रु, हास और क्रंदन भी ।
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अमूर्त, अस्फुट, बीज भाव के,
जब भी उगें, संरक्षण उनका,
बचा-बचा कर अतिरेकों से,
करता पालन-पोषण, सिंचन भी ।
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जलें, बुझें असंख्य भाव पर,
जड़ता कभी स्वीकार्य नहीं,
विपरीत सही पर भिन्न मतों का,
विच्छेदन और विश्लेषण भी ।
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सूक्ष्म संवेदना, गहन अनुभूति,
दुर्लभ अलौकिकता का रोमांच,
इस प्रांगण सब संग क्रीड़ारत,
युद्ध, पलायन, विचरण भी ।
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संतोष यहीं, संताप यहीं पर,
हर विद्रूप, विपर्यय का घर,
सुंदरता का निर्माण यहीं हो,
यहीं कुटिलता का नर्तन भी ।
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बंधुत्व भाव, सहयोग सखावत,
मूल्यों पर जीवन का उत्सर्ग,
क्षणिक आवेश में सर्वस्व स्वाहा,
और शून्य-अनंत का मंथन भी ।
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स्वयं ही बनते, टूटते बुदबुद,
और समगति प्रवाह की धीर नदी,
अनियंत्रित गर्जन, नाद प्रलय का,
और निस्सहाय चित्त का स्तवन भी ।
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आश्चर्य नहीं कि इस गह्वर से,
छल, क्षद्म, घात भी जनमे हैं,
रूप उकेरने के लिये पटल पर,
आवश्यक प्रतिरूप का अंकन भी ।
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यह मूल्य भी नव निर्माण का,
सदैव स्वीकारे यह नि:संकोच,
घाटी से होकर ही प्रशस्त,
मार्ग शिखर के आरोहन की ।
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ऋणी ऋणात्मक भावों का
कि सत्य उजागर है सम्मुख,
तम के घर्षण से प्रकाश कर,
आलोकित पथ उन्नयन की ।
