आनंद और अस्तित्व

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अधमुंदी आँखों से भोर की पहली किरण को निहारने में,

नये दिन की खुशी को मन में उतारने में,

सुबह उठ कर दरवाजा खोलने में,

अपने से नया कुछ कहने बोलने में,

जो समय जाता है,

मुझसे हो कर जाता है,

पूरी तरह मेरा बन पाता है ।

बाकी समय तो हर बार,

मेरे ऊपर से गुजरता है,

रीढ़ को पत्थरों की तरह रौंदते हुए,

आँखों में बिजली की तरह कौंधते हुए,

मुझमें आगे सफर के लिये ईंधन भरता है ।

मानता हूँ कि निश्चय ही मुझे जीवन में आगे करता है ।

चुनने का नहीं चिंतन का विषय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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अपने मन की व्यथा के दिखने के पहले,

अपने संघर्ष की कथा लिखने के पहले,

आँखें जब जाती हैं ठहर,

रात में टिमटिमाते तारों की नटखट आँखमिचौली पर,

बादलों के हर पल बनते बिगड़े घर,

हवाओं में झूमते पेड़-पौधे करते जीवन का मनुहार,

सब की अपनी कहानी, सब के अपने श्रृंगार ।

प्रकृति के इस वरदान को निहारने में,

इस जीवित सुंदरता को अंगीकारने में,

जो समय गुजरता है,

मेरे चित्त का अंश बन मुझमें ठहरता है ।

बाकी मुझे रंगते हैं, रंगमंच के कलाकार की तरह,

कहते हैं, समर्थ बन, अर्जन कर,

नहीं जी सकते जीवन एक उधार की तरह ।

उनको भी प्रणाम, जीवन के आभार की तरह ।

जीवन समन्वय है, यहाँ दोनों का विलय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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श्रम से लथपथ दिन के अवसान पर,

अपने अस्त्र-शस्त्र को थोड़ी देर के लिये अलग कर,

अपने लिये ढूँढने चलता हूँ खुशियाँ,

लगती है मुझे अपनी कर्जदार यह दुनिया,

तभी अचानक जो कोई आ के मिलता है,

गले लगाता है,

अपनी कहानी सुनाता है,

मुझमें सहसा वांछित होने का भाव जगाता है,

और मेरी सूखी आँखों में नमी भर जाता है,

उसकी मुस्कुराहट मैं अपनी खुशी पा लेता हूँ,

और अपनी खोज को विश्राम दे देता हूँ ।

अपनी खुशी की खोज की शुरुआत से लेकर,

इस विराम के बीच का समय,

मेरे मानव होने की परिभाषा है,

पूरी करता मेरी पहली अभिलाषा है ।

बाकी मुझे व्यवहार के गणित सिखाते,

जीवन की गणना में पटु बनाते,

कला हैं, कौशल हैं ।

उन्हें अपना नहीं भी कहूँ तो, कोई विवाद नहीं,

उचित हैं, निर्मल हैं ।

त्याग भी, संग्रह भी, रहस्य है, विस्मय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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हर चमकते तारे को तोड़ लाने की ललक में बढ़ते हाथ,

नहीं जान पाते, सफर में किस-किस का छूटा साथ,

न जाने कितने रणो को जीतने के बाद,

कितने ही प्रणो को हारने के बाद,

उभरा मन के पटल पर,

जीवन का एक अर्थ,

लेना एक प्रवृत्ति है,

और देना एक सामर्थ्य ।

समूह से, समाज से,

सृष्टि से, प्रकृति से,

भूत से, वर्तमान से,

आदि से और इति से,

सदा कुछ न कुछ लेने वाला,

क्या दे सकता है,

कृतज्ञता के सिवाय?

ललक में हाथ के उठने से,

कृतज्ञता के भाव के जगने तक,

जो समय गुजरता है,

मेरे आभारों का खजाना है ।

बाकी दिनचर्या हैं,

बहुत ही उपयोगी ऐसा मैं ने जाना है ।

सामान्य से ही विशिष्ट का होता अभ्युदय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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जीवन हर पल है,

बहता ही रहता, तरल है,

सारी उलझनों के बावजूद,

मन के अवगुंठनों से सरल है ।

पर कुछ जो इसे उत्कर्ष भरता है,

धन्यता देता है, हर्ष भरता है,

अपने अंतर्मन से बिना पूर्वाग्रह के बातें करना,

दूसरों के सुख-दुख को अपने से आगे रखना,

चारों ओर बिखरी सुंदरता का अध्ययन, आस्वादन,

सृष्टि के रचनाकार का,

इस जीवन के लिये आभार पूर्ण नमन,

जीवन को उस बिंदु तक ले जाते हैं,

जहाँ आनंद और होना एक हो जाते हैं ।

ये वह पल हैं जहाँ मन और प्राण का होता परस्पर विलय है ।

एक आनंद और एक अस्तित्व से जुड़ा समय है ।

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