हर बार मना लेता है

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जंग जिन्दगी का मुझसे माँग क्या-क्या लेता है,

एक मेरा दिल है कि मुझे हर बार मना लेता है।

सिर्फ जख्म ही नहीं मरहम भी दिये हैं इसने,

मना करता रहूँ फिर भी हाथों से लगा देता है।

एक मैं हूँ कि दुनियाँ से अदावत किये बैठा हूँ,

एक वो है कि किसीसे भी अपनापन जता लेता है।

सहमा-सहमा-सा मैं मुड़ के  लौट जाऊँ कहीं से,

इससे पहले ही कदम अपना वो आगे बढा लेता है।

मायूस न हो जाऊँ देख उसकी आँखों में आँसू मैं,

जब भी रोता है तो अपना चेहरा छुपा लेता है।

जब भी पनाह आँखों में नींद को नहीं मिलती है,

चुपके से उन्हें अपने घर का पता बता देता है।

मैं चूक भी जाऊँ तो कोई रंज नहीं होता उसको,

बड़े खयाल से मेरे गुनाह आगोश में छुपा लेता है।

अपने सपनों से डर के जब भी जगता हूँ अंधेरों में,

फेर हाथ सर पे मेरे अपनी बाहों में सुला लेता है।

जब भी भूलता हूँ किसी दर्द से अपने रिश्ते को,

उस दर्द का हासिल मुझे सिलसिलेवार बता देता है।

है बड़ी छोटी-सी चीज अदावत कर लेना यारों,

बड़े मुहब्बत से मुझे हर बार ये समझा लेता है।

मुकम्मल होने की जद्दोजहद में मुझको पा कर,

मुस्कुरा के मेरी कोशिश को मुकम्मल बना देता है।

मेरी खुशियों में शरीक हुए हैं कई हमसफर यूँ तो,

एक यही है कि गम में भी चार चांद लगा देता है।

आरजू यही कि वह रूठे नहीं मुझसे कभी भी,

जब वो रूठता है तो मुझे अजनबी बना देता है।

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2 thoughts on “हर बार मना लेता है”

  1. एक युद्ध आहत
    और अविभाज्य मानवीय गरिमा को मारता है

    मुझे
    कायल
    आत्मा और आत्मा
    दोनों मुझ में हैं
    वहाँ से बाहर नहीं

    मैं अपने पापों के लिए स्वयं जिम्मेदार हूँ
    मेरे बुरे कर्मों को आत्मा से मिटाया नहीं जा सकता

    मैं अपने पापों का बोझ ढोता हूं
    मेरे पाप मेरा चेहरा खींचते हैं
    मैं अपने पापों को सहन करता हूँ
    मेरे जीवन के अंत तक

    मैं समय हूँ
    मेरे कम समय में

    मैं कहां निराश हूं
    जब मैं रोता हूँ
    आपको नहीं करना चाहिए
    मेरा दर्द
    देखना नहीं
    मेरे चेहरे पर

    सपना आत्मा का मुखपत्र है
    आत्मा के ड्रामा में
    जिसमें मैं लेखक नहीं हूँ
    मैं नाटक में केवल एक सहायक भूमिका निभाता हूं

    प्यार शब्द एक संकेत है एक प्रतीक
    वह प्यार जो बहुत कुछ वादा करता है और कुछ नहीं रखता

    मैं हूँ
    मैं करूंगा
    हमेशा के लिए एक अपूर्ण मानव बने रहें

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