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सपना था या सम्मोहन,
निर्बाध गति या जड़ता का बंधन,
मन उस क्षण को जान न पाया,
थोड़ा झिझका और फिर पूछ लिया,
क्या हो तुम बतलाओगे,
छू लूँ यदि तुमको,
तो तुम बदल तो न जाओगे?
.
सुरभित नीरवता चारों ओर,
हर दृष्टि अचंभित, भाव विभोर,
पग तल धरती, पर भार नहीं,
साक्षात सुंदरता, पर कोई आकार नहीं,
यह क्या है,
अस्तित्व का कौन-सा आयाम,
विकल कि यह क्षण-भंगुर ही होगा,
जिज्ञासा वश पूछ ही डाला,
तुम्हें अपना कह बाँहों में भर लूँ,
क्या इतने निकट कभी आ पाओगे,
मेरे पास आते ही सिमट तो न जाओगे?
.
प्रज्वलित दिगंत, दृग से उठते अंगार,
स्तब्ध प्रकृति, गूँजती प्रत्यंचा की टंकार,
शौर्य धधकता दावानल-सा,
नये सृजन का ज्वर सर चढ़ता,
कोई बार-बार अंतर्मन में कहता,
यही तो तुमने चाहा था,
अब क्या दुविधा, अब क्या बाधा,
पर मन कहता तनिक ठहर,
मैं अपनी साँसें समेट लूँ,
कृतज्ञता का ज्ञापन कर लूँ,
और फिर तेरे संग चलूँ,
क्या इतनी प्रतीक्षा मेरी कर पाओगे,
मुझे छोड़ तिरोहित तो न हो जाओगे?
.
जीवन से परिचय सम्पूर्ण नहीं,
यदि उन प्रदेश से सम्पर्क नहीं,
जहाँ नीरवता हो गुंजायमान,
आभिजात्य समक्ष हो मूर्तिमान,
शौर्य सहचर नवनिर्माण का,
संशय बल दे समाधान का ।
.
स्पर्श, आलिंगन या सम्मोहन,
जिज्ञासा, स्नेह या सहज आकर्षण,
प्रेरित करते जुड़ने को सृष्टि के महा प्रवाह से,
एक होने को अनंत और अथाह से,
हर विस्मय और हर कौतुक,
जीवन के उतने ही शाश्वत रंग हैं,
जितने शौर्य और संवेदना इसके अंग हैं,
ऐसा मान कर चलूँ तो साथ तुम आओगे,
जानता हूँ कि तुम मेरे विश्वास को कभी नहीं झुठलाओगे ।
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