
अमृत कलश तो साथ था उनके,
और उन्हें इसका ज्ञान भी था,
कल्याण समाहित मानवता का इसमें,
ऐसा उनका अनुमान भी था ।
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वह बना आराध्य, सहज प्रतीक,
प्रेरणा श्रोत सकल जन मानस का,
बांधे एक सूत्र में समष्टि को,
पूजनीय हर स्थिति में सर्वथा ।
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वहाँ पड़ा कलश, अमृत उसमें,
सामर्थ्य भी कब तक धैर्य रखे,
शेष प्रतीक्षा करें अवश्य ही,
जो जिज्ञासु क्यों न आज चखे ?
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कल पर कितना विश्वास धरें,
हो माया या हो मरीचिका,
क्यों न मिले मुझे अपना हिस्सा,
उत्तम, यदि सामर्थ्य आज बढ़ा ।
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भाग सभी के रहें सुरक्षित,
दे मेरा भाग, आभारी मैं,
बस अपने निर्णय स्वयं करूँ,
निश्चय इतने का अधिकारी मैं ।
अभिनव कुछ ऐसे विचारों ने,
कुछ ऐसे प्रश्नों को जन्म दिया,
अर्थ सकल कल्याण का भी,
असहज संशय के बीच घिरा ।
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‘अयं निज:, परो वेति’ का,
उच्चारण पहली बार हुआ,
वसुधैव कुटुम्बकम के बाहर,
स्वीकृत मनुज व्यवहार हुआ ।
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कलश विभाजन का अर्थ,
जिस क्षण मंथन में संयुक्त हुआ,
जन मानस विवेचना में उलझा,
अमृत का बल विलुप्त हुआ ।
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अपनी दिशाएँ चुनी है हमनें,
निर्णय कर इस बिंदु तक आये,
पश्चाताप, दुख, विलाप वृथा,
हम प्रारब्ध नहीं, कर्मों के जाये ।
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बिना किसी अभियोग या लज्जा,
स्वीकारें हम अपने वर्तमान,
पर पल भर थम कर लें विचार,
कहाँ बीते में निहित भविष्य का ज्ञान ।
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शाश्वत हैं, पाने की इच्छा, खोने का भय,
पर निज हित मात्र नहीं मानवता की जय,
दूसरों की खुशी में खुश होना एक कला है,
जिसने प्रारम्भ से ही मानव जाति को छला है ।
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