क्षत पत्र

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मात्र एक क्षत पत्र हूँ ,

हर काल हूँ , सर्वत्र हूँ।

कर्तव्य च्युत नहीं,

आंधियाँ सही- लड़ा, भागा नहीं,

जगा रहा सोया नहीं,

अटका-लटका,

उड़ा,

दूर-दूर तक गया,

कोई शिकायत नहीं,

कि मुझे किसी ने छू कर मुझको,

तनिक भी अपनापन नहीं दिया।

जमीन पर पड़ा रहता हूँ,

मिट्टी में समाता हूँ,

अपने आपको खो कर मैं

एक पेड़ बन जाता हूँ।

फिर उसी में उगता हूँ,

और अपनी टहनी पर लटक जाता हूँ।

कोई अपेक्षा नहीं,

किसीकी उपेक्षा नहीं,

कोई अभिमान नहीं,

सृष्टि का मौलिक उपादान हूँ,

एक शाश्वत प्राण हूँ।

अजेय हूँ , अमिट हूँ ,

सरल जीवन चक्र हूँ।

 

मात्र एक क्षत पत्र हूँ ,

हर काल हूँ , सर्वत्र हूँ।

दुआ

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शायद जरूरत भी नहीं है ,

और मैं दुनियाँ को बदलने का

दावा नहीं करता,

जमीन से थोड़ा ऊपर चलने का

दिखावा नहीं करता,

कोशिश बस इतनी है कि

कोशिश में कमी ना रहे,

थोड़े-से ही बदलें सही,

हाले-सूरत ऐसी ही बनी ना रहे।

 

जो अच्छा है, कयों अच्छा है

मालूम हो मुझे,

जो अच्छा नहीं, कयों अच्छा नहीं

बात छुपी ये ना रहे।

 

भूख का है इल्म मुझको,

इससे कोई समझौता नहीं,

वजह बहुत से और भी हैं,

आँसुओं के बहने के।

 

सारे आँसू पोंछ डालूँ

शायद हो मुमकिन नहीं,

पर किसी को हक न हो कि,

वह किसी को चोट दे।

 

मुस्कुराना लगता है अच्छा,

जैसे तुम्हें वैसे मुझे,

चाहता हूँ जब जो चाहे,

खिलखिला कर हँस सके।

 

वक्त बहुत लग जायेगा,

है इसका डर मुझको भी पर,

आँसू नहीं रुके हैं किसीके,

हँसी किसी की छीन के।

 

जो करूँ जैसा करूँ

अब सब तुम्हारे हाथ है,

बस इतनी दुआ दे कि,

ना हिलूँ कभी यकीन से।

बचपन

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अब भी आँखें भर आती हैं,

रुकती नहीं छलक जाती हैं ,

अब भी चेहरा खिल जाता है,

जो सरे-आम कोई मिल जाता है।

अब भी ढोल पर थाप पड़े तो,

झूम कर कोई नाच उठे तो,

मन को बड़ा अच्छा लगता है।

जिन्दा है बच्चा लगता है।

 

उम्र में इतने बड़े हो गये हैं,

फिर भी रोएँ खड़े हो गये हैं,

साँझ, अंधेरी रात से डरना,

मिले जो भी वह हाथ पकड़ना,

बात पुरानी याद जो आयी,

सुबह-सुबह बजती शहनाई

जैसे मन पर रचा हुआ है,

अब भी बचपन बचा हुआ है।

 

हर सुबह एक नया सवेरा,

शाम घने तिलस्म का घेरा,

जुगनुओँ की आँख मिचौली,

हरदम चलती हँसी ठिठोली,

जगे हुए सपना लगता है,

मन ही मन अपना लगता है,

माँग रहा है थका हुआ मन,

खेल कूद मिट्टी में सन-सन।

 

कभी कहा नहीं ‘इतना ही बस’,

कुछ भी कर जाने का साहस,

हार मिली तो मान लिया,

रुक,फिर लड़ने का ठान लिया,

नहीं ग्लानि जो न मिली सफलता,

अगर किया जो था कर सकता,

बिन पेंचों की सीधी बातें,

चकमक तारे नीन्द की रातें।

 

गुरू-ज्ञानी जन यही बताते,

पर कैसे, समझा नहीं पाते,

जोड़ें बिन गाँठों के जैसे,

स्वार्थ बिना उद्देश्य हो कैसे?

संभव है यदि दुख के दर्शन,

निर्माण करे ना दुख के कारण,

बीज सभी से अपनेपन का,

मरा नहीं, है पनप रहा,

स्नेह की उसे तरलता दे दो,

बचपन की सरलता दे दो।

 

कठिन सही पर बात कहो एक,

सरल-गलत कर जियोगे कब तक,

करो कभी जो सच्चा लगता है,

मन को बड़ा अच्छा लगता है।

जिन्दा है बच्चा लगता है।

कर्म दे दो

 

monk holding prayer beads across mountain
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अमरत्व के दर्शन,

सृष्टि के उद्गम की सोच,

अभी रहने दो।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष,

ज्ञान सभी रहने दो,

अभी मुझे तुम कर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

बहुत भूख है करनी ठंढी,

फसल बहुत-से बोने हैं,

आँसू की कालिख बहुत-से

बच्चों के मुँह से धोने हैं।

रोक सम्मोहन सपनों का,

विष, ताप सहे वह चर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

 

मै ने देखे अंधकूप हैं,

और उनमें बसते जीवन को,

भावशून्यता उनकी करती,

अंधकारमय इस मन को।

रख लालिमा भोर-साँझ की,

जल दीप बनूँ, वह मर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

सर के ऊपर जगह नहीं है,

झुकना शायद जरूरी है,

पर आकाश ज्ञान नही हो,

ऐसी क्या मजबूरी है?

ऊंचा छत और आकाश बनूँ,

सर कुछ उठें मुझसे ऐसे कुछ सत्कर्म दे दो।

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

 

बिन आँसू के हँसती आँखें,

सहज मान से उन्नत शीष,

हर कोने में दीप जले हों,

हर मन ईश्वर का आशीष।

फिर मुझे लालित्य दो,

रस-रंग दो, जगत-धर्म दे दो।

अभी,

सतयुग और परलोक रख लो,

प्रगति का सद-धर्म दे दो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

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मेरे अंतर्मन की व्याकुलता को,

अपने स्नेह-स्पर्ष से

स्वीकार में बदलते हो,

दिखते नहीं,

कोई कहता नहीं,

पर मुझे लगता है हर पल,

तुम साथ मेरे चलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

जीवन मरु के नग्न ताप में

दग्ध हो जाती  संवेदनाएँ,

मन के तंतु चीख-चीख कर,

माँगती शीतल जल धाराएँ,

मुझ से छुपकर, मुझ से भी पहले,

तुम ही तो पिघलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

निज लघुता के हाहाकार में,

दसों दिश छाते अंधकार में,

अर्थहीन लगते जीवन के,

विकृत भयावने विस्तार में,

सगा, अबोध या निरीह समझ

पथ प्रकाश को जलते हो।

बंधु, क्यौं छलते हो?

 

भर सामर्थ्य के उन्मादों में,

इतराया जो धरातल से ऊपर,

या प्रमाद कीर्ति का किंचित भी

छाया, तो तुमने अंगुली ली धर,

कैसे-कैसे सूक्ष्म संकेत,

देते हो मुझे सम्हलने को।

बंधु, क्यौं छलते हो?

और जीवन चलता रहा।

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और जीवन चलता रहा।

 

हाथ टटोलते घुप अंधेरे,

विवेक हीन अज्ञान ने मेरे,

जो छुआ उसे अपना माना,

कृतज्ञ हृदय, बाहों में घेरे।

पहली संवेदना- स्वीकार की,

जगी, प्रवाह का उद्गम बना।

और जीवन चलता रहा।

 

पहला ज्ञान स्वीकार का

जिज्ञासा कितने जगा गयी,

साहस यहीं कहीं पनपा,

फिर कथा पराक्रम शुरू हुई।

कौतूहल, विश्वास ने मिल कर

अब साहस का हाथ धरा।

और जीवन चलता रहा।

 

बढा कदम अनुसंधान का,

स्वभाव नही सीमित हो रहना,

न बंधन करे कातर कोई,

शीष उठा पूरा कर सपना।

चला प्रगति रथ उर्ध्व दिशा,

मानव मन को विस्तार मिला।

और जीवन चलता रहा।

 

अंध कूप से पार क्षितिज,

कहानी है अदम्य चेतना की,

अडिग संकल्प, उत्सर्ग प्राण का,

सृष्टि पर्व की, वेदना की।

नत, विनीत; पर मनुज ही क्या

जो विपदा से डर रुक गया।

और जीवन चलता रहा।

 

साँस

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नमी है, उष्णता है,

ऊर्जा है, गति है।

विश्वास है, निरंतरता है,

प्राण की अनुभूति है।

 

आरोह में अवरोह में

महसूस कर रहा हूँ,

साँसों को अपनी,

जैसे स्वयम को जानने की शुरुआत हो,

इस अकेलेपन में शायद खुद से फिर मुलाकात हो।

 

दहकती दोपहर में,

उनींदी आँख सहर में,

घबड़ाया जो दिल तो,

अपने अंदर टटोला,

जो बच्चा रो रहा था,

जो पागल हँस रहा था,

दोनो से बोला,

क्या मैं ‘तुम लोग’ हूँ?

किस से पूछूँ, कैसे पहचानूँ?

 

वे हैरत से बोले ‘पता नहीं’,

खुद से पूछो,

क्यौं हमें उलझाते हो,

हम यूँ हीं भले हैं,

कुसूर बस इतना है कि तेरे संग हो चले हैं।

 

कदम पीछे हटा लिया,

वह बच्चा भी अच्छा था,

और वह पागल भी सच्चा था।

‘वे नहीं मैं,’

सोच कर चल पड़ा था,

क्या कह कर विदा लूँ –

दुविधा में खड़ा था,

कि अनायास,

ली एक उच्छवास,

अरे, यह क्या?

क्या प्राण मेरे कोई संकेत मुझको दे रहे हैं?

‘हम तीनो साँस एक साथ ले रहे हैं।‘

 

द्रवित हृदय से गले लगाया,

‘तुम मैं हो।‘ उन्हे बताया।

उत्तर में वह दोनो बोले,

‘हिचक मत, अपनी राह हो ले।

डर मत,

हम कहीं नहीं जाते,

हम कभी नहीं मरते।

हाँ,

कभी-कभी तुम ही इतनी दूर चले जाते हो,

कि हमें देख नहीं पाते हो।

और ये जो साँसों की डोर बंधी है,

इसे मत तोड़ना।

अच्छा चलो, जाओ,

प्रत्यक्ष तुम्हारी जो जिंदगी है,

उससे मुँह कभी मत मोड़ना।‘

 

आँखों में नमी लिये,

सीने में आभार लिये,

मन में अनोखा-सा यह

साँसों का उपहार लिये,

चल पड़ा मैं निपट अकेला,

जैसे सचमुच,

यह स्वयम को जानने की शुरुआत हो,

इस अकेलेपन में शायद खुद से फिर मुलाकात हो।

आवरण

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खिंचाव उतना ही बढता है,

आवरण जितना महीन होता है,

और ऐसे में नजर झिलमिलाती है,

सोच ठहर जाती है,

अपनी ही समझ पर,

कहाँ खुद को भी पूरा यकीन होता है।

 

हिम्मत,

जैसे हैं वैसे दिखने की,

गिरवी रख दी, बहुत पहले,

हमने एक दिन,

जब कहा किसी को अपना,

और किसीसे कि रह लेंगे तेरे बिन।

 

छुपाये रखना बहुत कुछ,

अब अदा नहीं रहा,

हमारे हकों में शुमार है,

हैरत की बात है लेकिन,

कि हर किसी से खुलेपन की

उम्मीद हमारी अब भी बरकरार है

 

कोई गफलत नहीं,

कि हम सर से पाँव तक,

अलग-अलग रंगों में रंगे पुते हैं,

और जहाँ रंगे नहीं हैं,

कई-कई पर्दों में ढके हुए हैं।

दम यह फिर भी भरते हैं,

कि हम जैसे बाहर हैं,

बिल्कुल वैसे ही अंदर हैं।

 

बात यदि यहीं तक होती,

तो शायद फिर भी कुछ होती।

हम

सब कुछ जानने वहम रखते है,

खिलाफ जिसके सारा जंग था,

मुड़-मुड़ के उन्ही राहों पर कदम रखते हैं।

 

इतना रंज इसलिये

कि औरों ने हमको सही नहीं माना।

सच तो दरअसल यह है कि

अपनी जिद में हमने तुम्हे नहीं जाना।

 

आओ

एक ईमानदार शुरुआत करें,

लकीरें खींचना छोड़ दें,

और इस भूल भुलैय्या से बाहर निकलें।

यकीन मानो

दुनियाँ लकीर के दोनो ओर एक-सी है,

फर्क सिर्फ इस बात का है कि

लकीर कहाँ है और हम कहाँ खड़े हैं,

क्यौंकि गलत हो कर भी खुदको

सही साबित करनेवाला सचमुच जहीन होता है।

खिंचाव उतना ही बढता है,

आवरण जितना महीन होता है।

बादल बरसता रहा रात भर

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बिन घाट देखे, बिन बाट देखे,

बादल बरसता रहा रात भर।

ना हाल पूछा, ना चाह पूछी,

बस अपनी ही कहता रहा रात भर।

 

ना वक्त देखा, ना नीन्द देखी,

बचपन के दोस्त-सा, अहमक,

पास बैठा रोता-लरजता रहा, फिर

दबे पाँव चल दिया मुँह फेर कर।

 

सवेरे धुला-धुला-सा था सारा समाँ,

जैसे कि ओस में पिघलती सुबह की धूप,

तन्हाई लग रही थी खूबसूरत इतनी,

जी चाहता था आज रो लूँ मैं जी भर।

 

खालीपन कैसे भरता है किसी को,

ऐसी एक नयी  समझ आयी,

वह हल्का करता रहा मुझे सवेरे,

खुद को मुझ में भर-भर कर।

 

जो चाहे और जब भी चाहे,

कह सके बिन लाग लपेटे के,

ऐसा एक बादल का टुकड़ा,

रखता हूँ सदा छुपा कर भीतर।

कहो दोस्त, अच्छे तो हो

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बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

अपना नहीं यादों का रिश्ता,

और नहीं वादों का रिश्ता,

जो भी जितना साझा है वह सब,

साझा हरदम किये रहो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

तेरी मेरी राह अलग थी,

अपनी अपनी चाह अलग थी,

अलग अलग हम जुड़ गये जितने,

उस बंधन की बात करो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

हीन पराजय, जय कोलाहल,

योजन दूर, पर एक धरातल,

जीत हार के भाव छलें ना,

कुछ ऐसे मेरी बाँह धरो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

ध्यान तुम्हारा घर का आंगन,

धूल भरा पर सुरभित बचपन,

दौड़ूँ तो गिरने का डर मन से

फूक मार तिरोहित कर दो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?

 

माँग रह हूँ कब से तुम से,

मुद्दत हुई जो तुमसे बिछड़े,

माँग मुझसे सखा भाव तुम

कुंठा सारी विगलित कर दो।

बहुत दिनों के बाद मिले हो!

कहो दोस्त, अच्छे तो हो?